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पाथेय बांध संबल, गंतव्य दूर तेरा॥ उठ जाग……

03 दिसम्बर
॥गंतव्य दूर तेरा॥
उठ जाग रे मुसाफ़िर, अब हो गया सवेरा।
पल पलक खोल प्यारे, अब मिट गया अंधेरा॥ उठ जाग……
प्राची में पो फ़टी है, पर फ़डफ़डाए पंखी।
चह चहचहा रहे है, निशि भर यहाँ बसेरा॥ उठ जाग……
लाली लिए खडी है, उषा तुझे जगाने।
सृष्टी सज़ी क्षणिक सी, अब उठने को है डेरा॥ उठ जाग……
वे उड चले विहंग गण, निज लक्ष साधना से।
आंखों में क्यूं ये तेरी, देती है नींद घेरा॥ उठ जाग……
साथी चले गये है, तूं सो रहा अभी भी।
झट चेत चेत चेतन, प्रमाद बना लूटेरा॥ उठ जाग……
सूरज चढा है साधक, प्रतिबोध दे रहा है।
पाथेय बांध संबल, गंतव्य दूर तेरा॥ उठ जाग……
                               रचनाकार: अज्ञात
(यह गीत मेरे लिये नवप्रभात का प्रेरक है)
_____________________________________________
 

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6 responses to “पाथेय बांध संबल, गंतव्य दूर तेरा॥ उठ जाग……

  1. महेन्द्र मिश्र

    03/12/2010 at 9:59 अपराह्न

    बढ़िया रचना भाव आभार सुज्ञ जी …

     
  2. sanjay jha

    04/12/2010 at 10:12 पूर्वाह्न

    ati sundar……pranam

     
  3. सुज्ञ

    04/12/2010 at 8:13 अपराह्न

    महेन्द्र मिश्र जी,संजय जी,रजनीश जी,सराहना के लिये आभार

     
  4. पं.डी.के.शर्मा"वत्स"

    04/12/2010 at 8:29 अपराह्न

    उठ जाग मुसाफिर भौर भई…..लेकिन मुसाफिर बेचारा क्या करे, गलती से कुम्भकर्णी निद्रासन का वर जो माँग बैठा है🙂

     
  5. विरेन्द्र सिंह चौहान

    07/12/2010 at 6:51 अपराह्न

    Bahut sunder aur sarthak………..

     

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ज्ञानदत्त पाण्डेय का हिन्दी ब्लॉग। मैं यह ब्लॉग लिखने के अलावा गाँव विक्रमपुर, जिला भदोही, उत्तरप्रदेश, भारत में रह कर ग्रामीण जीवन जानने का प्रयास कर रहा हूँ। रेलवे से ज़ोनल रेलवे के विभागाध्यक्ष के पद से रिटायर्ड अफसर।

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