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इतना भी क्या अहसान फ़रामोश। हद है कृतघ्नता की !!!

26 नवम्बर
             तेरे जीवन निर्वाह के लिये,तेरी आवश्यकता से भी अधिक संसाधन तुझे प्रकृति ने दिए, और तुने उसका अनियंत्रित अनवरत दोहन  व शोषण आरंभ कर दिया। तुझे प्रकृति ने धरा का मुखिया बनाया, तुने अन्य सदस्यों के मुंह का निवाला भी छीन लिया। तेरी सहायता के लिये प्राणी बने, तुने उन्हे पेट का खड्डा भरने का साधन बनाया। सवाल पेट का होता तो जननी इतनी दुखी न होती। पर स्वाद की खातिर, इतना भ्रष्ट हुआ कि अखिल प्रकृति पाकर भी तूं, धृष्टता से भूख और अभाव के बहाने बनाता रहा। तेरे पेट की तृष्णा तो कदाचित शान्त हो जाय, पर तेरी बेलगाम इच्छाओं की तृष्णा कभी शान्त न हुई, कृतघ्न मानव।

            जितना लिया इस प्रकृति से, उसका रत्तीभर अंश भी लौटाने की तेरी नीयत नहिं। लौटाना क्या संयत उपयोग की भी तेरी कामना  न बनी। प्रकृति ने तुझे संतति विस्तार का वरदान दियातूं अपनी संतान को माँ प्रकृति  के संरक्षण में नियुक्त करता, अपनी संतति को प्रकृति के मितव्ययी उपभोग का ज्ञान देता। निर्लज्ज, इसी तरह संतति विस्तार के वरदान का ॠण चुकाता। किन्तु तुने अपनी औलादों से लूटेरो की फ़ौज़ बनाई और छोड दिया कृपालु प्रकृति को रौंदने के लिए। वन लूटे, जीव-प्राण लूटे, पहाड के पहाड लूटे।निर्मल बहती नदियाँ लूटी,उपजाऊ जमीने लूटी। समुद्र का खार लूटा, स्वर्णधूल अंबार लूटा। इससे भी न पेट भरा तो, खोद तरल तेल भी लूटा।

               तूने तो प्रकृति के सारे गहने उतार, उसे उजाड ही कर दियाहे! बंजरप्रिय!! कृतघ्न मानव!!! प्रकृति तो फ़िर भी ममतामयी माँ ही है, उससे तो तेरा कोई दुख देखा नहिं जाताउसकी यह चिंता रहती है, कि मेरे उजाड पर्यावरण से भी बच्चो को तकलीफ न हो। वह ईशारे दे दे कर संयम का संदेश दे रही है। पर तूं भोगलिप्त भूखा जानकर भी अज्ञानी ही बना रहा। कर्ज़ मुक्त होने की तेरी कभी भी नीयत न रही। हे! अहसान फ़रामोश इन्सान!! कृतघ्न मानव!!!

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7 responses to “इतना भी क्या अहसान फ़रामोश। हद है कृतघ्नता की !!!

  1. पं.डी.के.शर्मा"वत्स"

    27/11/2010 at 12:15 पूर्वाह्न

    प्रकृति के यहाँ कठोर दंड का प्रावधान नहीं है. वो दंड भी देती है तो वो कभी भी मानवीय धैर्य और सहनशीलता की हद नहीं तोडती…शायद इसी लिए…

     
  2. निर्मला कपिला

    27/11/2010 at 10:16 पूर्वाह्न

    बिलकुल सही कहा आपने मानव ने सभी हदें पार कर दी। प्रकृ्रि से सीखने के बजाये उसे नष्ट करने पर तुला है। तृष्णा वो भूख है जो कभी नही मिटती। अच्छी लगी पोस्ट। धन्यवाद।

     
  3. sanjay

    27/11/2010 at 11:06 पूर्वाह्न

    पर तेरी बेलगाम इच्छाओं की तृष्णा कभी शान्त न हुई, कृतघ्न मानव।kitni sachhi bat….pranam.

     
  4. Tausif Hindustani

    27/11/2010 at 11:12 पूर्वाह्न

    क्या बात है 'सुज्ञ' जी एक ही लेख कई ब्लॉग पर चलिए अच्छा ही है , सुन्दर विचार जिंतनी दूर तक पहुंचे उतना ही अच्छा dabirnews.blogspot.com

     
  5. विरेन्द्र सिंह चौहान

    29/11/2010 at 8:00 अपराह्न

    आपसे सहमत हूँ.

     
  6. विरेन्द्र सिंह चौहान

    29/11/2010 at 8:00 अपराह्न

    आपसे सहमत हूँ.

     
  7. ZEAL

    30/11/2010 at 5:53 अपराह्न

    अपने पर्यावरण का ध्यान नहीं रखेंगे तो विपरीत परिणाम भुगतने ही पड़ेंगे।

     

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ज्ञानदत्त पाण्डेय का हिन्दी ब्लॉग। मैं गाँव विक्रमपुर, जिला भदोही, उत्तरप्रदेश, भारत में रह कर ग्रामीण जीवन जानने का प्रयास कर रहा हूँ। ज़ोनल रेलवे के विभागाध्यक्ष के पद से रिटायर रेलवे अफसर।

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