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घबराए जब मन अनमोल

18 नवम्बर

घबराए जब मन अनमोल, चित हो जाए डांवाडोल।

तब मानव तूं अन्तर खोल, धम्मं शरणं गच्छामि॥

पर्वत सम जब बाधा हो, घनघोर घटा सम उल्झन हो।

तब तुझमें बस चिंतन हो, धम्मं शरणं गच्छामि॥


चिंता साथ न छोड रही, कल्पना आगे दौड रही।

शुभ्र ध्यान हित बोल सही, धम्मं शरणं गच्छामि॥


रोग भी मन आघात करे, मन रह रह प्रलाप करे।

शरण तेरे संताप हरे, धम्मं शरणं गच्छामि॥
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4 responses to “घबराए जब मन अनमोल

  1. अमित शर्मा

    18/11/2010 at 8:18 पूर्वाह्न

    धम्मं शरणं गच्छामि॥सत्य वचन !धर्म की शरण ही कल्याणकारी है, लेकिन उपासना पद्दत्ति धर्म नहीं हो सकती …………..धर्म तो मानव का सहज स्वभाव है जो की जीवन के प्रत्येक पल जिया जाता है

     
  2. अमित शर्मा

    18/11/2010 at 8:23 पूर्वाह्न

    सात्विक , परोपकारी, जीवन जीते हुए परसेवा निरत कर्म करने वाला ही धार्मिक कहलाने का अधिकारी है

     
  3. सुज्ञ

    18/11/2010 at 10:45 पूर्वाह्न

    अमित जी,सही कहा,उपासना पद्दत्ति धर्म नहीं हो सकती.शुद्ध आत्म उपकारी, कल्याणकारी धर्म ही 'धर्म'है। यही आशय है।

     
  4. ZEAL

    18/11/2010 at 7:59 अपराह्न

    .धर्म का बोध कराती सार्थक रचना । .

     

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ज्ञानदत्त पाण्डेय का हिन्दी ब्लॉग। मैं यह ब्लॉग लिखने के अलावा गाँव विक्रमपुर, जिला भदोही, उत्तरप्रदेश, भारत में रह कर ग्रामीण जीवन जानने का प्रयास कर रहा हूँ। रेलवे से ज़ोनल रेलवे के विभागाध्यक्ष के पद से रिटायर्ड अफसर।

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