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सुख दुःख तो मात्र बहाना है, सभी को अपना अहम् ही सहलाना है।

15 नवम्बर

बचपन में एक चुटकला सुना था, लोग रेल यात्रा कर रहे थे। एक व्यक्ति खडा हुआ और खिडकी खोल दी, थोडी ही देर में दूसरा यात्री उठा और उसने खिडकी बंद कर दी। पहले को उसका यह बंद करना नागवार गुजरा और उठ कर खिडकी पुनः खोलदी। एक बंद करता दूसरा खोल देता। नाटक शुरु हो गया। यात्रियों का मनोरंजन हो रहा था, लेकिन अंततः सभी तंग आ गये। टी टी को बुलाया गया, टी टी ने पुछा- “महाशय ! यह क्या कर रहे हो? क्यों बार बार खोल-बंद कर रहे हो?” पहला यात्री बोला- क्यों न खोलूं , “मैं गर्मी से परेशान हूं, खिडकी खुली ही रहनी चाहिए।” टी टी ने दूसरे यात्री को कहा- “भाई आपको क्या आपत्ति है, अगर खिडकी खुली रहे।” इस दूसरे यात्री ने कहा मुझे ठंड लग रही है, मुझे ठंड सहन नहीं होती। टी टी बेचारा परेशान, एक को गर्मी लग रही है तो दूसरे को ठंड। टी टी यह सोचकर खिडकी के पास गया कि कोई बीच का रास्ता निकल आए। उसने देखा और मुस्करा दिया। खिडकी में शीशा था ही नहीं। वहाँ तो मात्र फ़्रेम थी, वह बोला- “कैसी गर्मी या कैसी ठंडी? यहां तो शीशा ही गायब है, आप दोनो तो मात्र फ़्रेम को ही उपर नीचे कर रहे हो।” 

वस्तुतः दोनों यात्री न तो गर्मी और न ही ठंडी से परेशान थे। वे परेशान थे तो मात्र अपने अभिमान से। अपने अहं पोषण में लिप्त थे, गर्मी या ठंडी का अस्तित्व ही नहीं था। 
अधिकांश कलह मात्र इसलिये होते है कि अहंकार को चोट पहुँचती है।और आदमी को सबसे ज्यादा आनंद दूसरे के अहंकार को चोट पहुँचाने में आता है्। साथ ही सबसे ज्यादा क्रोध अपने अहंकार पर चोट लगने से होता है। जो दूसरो के अहंकार को चोट पहुँचाने में सफ़ल होता है, वह मान लेता है उसने बहुत ही बड़ा गढ़ जीत लिया, वह यह मानकर चलता है कि दूसरों के स्वाभिमान की रेखा को काटपीट कर ही वह सम्मानित बन सकता है। किन्तु परिणाम अज्ञानता भरी शर्म से अधिक कुछ नहीं होता। अधिकांश लडाईयों के पिछे कारण एक छोटा सा अहम् ही होता है। _____________________________________________________
 

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6 responses to “सुख दुःख तो मात्र बहाना है, सभी को अपना अहम् ही सहलाना है।

  1. M VERMA

    15/11/2010 at 6:29 पूर्वाह्न

    सुन्दर प्रसंग और सीख अहम के कारण ही हम अ हम हो गये हैं

     
  2. Arvind Mishra

    15/11/2010 at 8:07 पूर्वाह्न

    एक अहम् पोस्ट -शुक्रिया !

     
  3. संगीता स्वरुप ( गीत )

    15/11/2010 at 9:24 पूर्वाह्न

    बहुत अच्छी पोस्ट …

     
  4. Smart Indian - स्मार्ट इंडियन

    15/11/2010 at 11:33 पूर्वाह्न

    अक्सर यही होता है।

     
  5. Er. Shilpa Mehta

    26/06/2012 at 8:26 अपराह्न

    hhmmm…

     
  6. दीपक बाबा

    27/06/2012 at 4:20 अपराह्न

    हाँ, बस मन का भ्रम ही मिटाना है.

     

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ज्ञानदत्त पाण्डेय का हिन्दी ब्लॉग। मैं यह ब्लॉग लिखने के अलावा गाँव विक्रमपुर, जिला भदोही, उत्तरप्रदेश, भारत में रह कर ग्रामीण जीवन जानने का प्रयास कर रहा हूँ। रेलवे से ज़ोनल रेलवे के विभागाध्यक्ष के पद से रिटायर्ड अफसर।

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