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दूषित आहार से क्रूर मनोवृति

15 नवम्बर

          मानव को उर्ज़ा पाने के लिये भोजन करना आवश्यक है, और इसमें भी दो मत नहिं कि मनुष्य को जीवित रहने के लिये अन्य जीवों पर आश्रित रहना ही पडता है। लेकिन, सृष्टि का सबसे बुद्धिमान प्राणी होने के नाते, दूसरे जीवों के प्रति उत्तरदायित्व पूर्वक सोचना भी, मानव का कर्तव्य है। इसलिये वह अपना भोजन प्रबंध कुछ इस प्रकार करे कि, आहार की इच्छा होने से लेकर, ग्रहण करने तक, सृष्टि की जीवराशी कम से कम खर्च हो। हिंसा तो वनस्पतिजन्य आहार में भी सम्भव है, लेकिन इसका यह तात्पर्य नहिं कि जब सभी तरह के आहार में हिंसा है, तो जानबुझ कर सबसे क्रूरत्तम हिंसा ही अपनाई जाय। यहाँ हमारा विवेक कहता है, जितना हिंसा से बचा जाये, बचना चाहिये।
                हमें यह न भुलना चाहिए, कि एक समान दिखने वाले कांच और हीरे के मूल्य में अंतर होता है। और वह अंतर उनकी गुणवत्ता के आधार पर होता है। उसी प्रकार एक बकरे के जीव और एक केले के जीव के जीवन-मूल्य में भी अंतर तो है ही।
                आहार का चुनाव करते समय हमें अपने विवेक को वैज्ञानिक अभिगम देना होगा। वैज्ञानिक दृष्टिकोण है कि सृष्टि में जीवन विकास, सुक्षम एकेन्द्रिय जीव से प्रारंभ होकर क्रमशः पंचेंद्रिय तक पहुँचा है। ऐसे में यदि हमारा जीवन कम से कम विकसित जीवो (एकेन्द्रिय जीव) की हिंसा से चल सकता है तो हमें कोई अधिकार नहिं हम उससे अधिक विकसित जीवों की अनावश्यक हिंसा करें। विकास के दृष्टिकोण से विकसित ( पशु) की हिंसा, प्रकृति के साथ जघन्य अपराध है।
                प्रकृति और अर्थशास्त्र का यह सिद्धांत है कि संसाधनो का विवेक पूर्वक ज्यादा से ज्यादा दक्षता से उपभोग किया जाय। मानव के पास ही वह बुद्धिमत्ता है कि वह उपलब्ध संसाधनो का सर्वोत्तम प्रबंध करे। अर्थार्त कम से कम संसाधन खर्च कर अधिक से अधिक उसका लाभ प्राप्त करे।
               जीव की इन्द्रियां उसके सुख दुख महसुस करने के माध्यम भी होती है, जो जीव जितनी भी इन्द्रियों की योगयता वाला है, उसे हिंसा के समय इतनी ही अधिक इन्द्रियों के माध्यम से पीडा पहुँचेगी, अर्थार्त पांचो ही इन्द्रिय धारक जीव को अधिक पीडा पहुँचेगी जो मानव मन में क्रूर भावों की उत्पत्ती का माध्यम बनेगी।

                मांस में केवल एक जीव का ही प्रश्न नहिं, जब जीव की मांस के लिये हत्या की जाती है, तो जान निकलते ही मक्खियां करोडों अंडे उस मुर्दे पर दे जाती है, पता नहीं जान निकलनें का एक क्षण में मक्खिओं को कैसे आभास हो जाता है, उसी क्षण से वह मांस मक्खिओं के लार्वा का भोजन बनता है, जिंदा जीव के मुर्दे में परिवर्तित होते ही असंख्य सुक्ष्म जीव उस मुर्दा मांस में पैदा हो जाते है। और जहां यह तैयार होता है, वे बुचड्खाने व बाज़ार रोगाणुओं के घर होते है, और यह रोगाणु भी जीव ही होते है। यानि ताज़ा मांस के टुकडे पर ही लाखों मक्खी के अंडे, लाखों सुक्ष्म जीव और लाखों रोगाणु होते है। इतना ही नहिं पकने के बाद भी मांस में जीवोत्पती निरंतर जारी रहती है। इसलिये, एक जीव का मांस होते हुए भी, संख्या के आधार पर अनंत जीवहिंसा का कारण बनता है।
                जीवन जीने की हर प्राणी में अदम्य इच्छा होती है, यहां तक कि कीट व जंतु भी कीटनाशक दवाओं के खिलाफ़ प्रतिकार शक्ति उत्पन्न कर लेते है। सुक्ष्म जीवाणु-रोगाणु भी कुछ समय बाद रोगप्रतिरोधक दवाओं के विरुद्ध जीवन बचाने के तरिके खोज लेते है। यह उनके जीनें की अदम्य जीजिविषा का परिणाम होता है, सभी जीना चाह्ते है मरना कोई नहिं चाहता। फिर प्राण बचाने को संघर्षरत पशुओं को मात्र स्वाद के लिये मार खाना तो क्रूरता की पराकाष्ठा है।
                येन केन पेट भरना ही मानव का लक्षय नहिं है। यह तो पशुओं का लक्षण है। प्रकृति प्रदत्त बुद्धि से ही हमने सभ्यता साधी। यही बुद्धि हमें यह विवेकशीलता भी प्रदान करती है, कि हमारे विचार और व्यवहार सौम्य व पवित्र बने रहे। हिंसाजन्य आहार लेने से, हिंसा के प्रति सम्वेदनाएं समाप्तप्राय हो जाती है। किसी दूसरे जीव के प्रति दया करूणा के भाव नष्ट हो जाते है। अनावश्यक हिंसा-भाव मन में रूढ हो जाता है, और हमारे आचरण में क्रूरता समाहित हो जाती है। ऐसी मनोदशा में, प्रतिकूलता उपस्थित होनें पर आवेश में, हिंसक कृत्य होना भी सम्भव है। आहार इसी तरह हमारे विचारों को प्रभावित करता है।
                हमारी सम्वेदनाओं और अनुकंपा भाव की रक्षा के लिये, व विचार और वर्तन को विशुद्ध रखनें के लिये शाकाहार ही हमारी पसंद होना चाहिए। और फ़िर जहां और जब तक हमें सात्विक पौष्ठिक शाकाहार, प्रचूरता से उपलब्ध है, वहां तो हमें जीवों को करूणा दान, अभयदान दे देना ही श्रेयस्कर है।

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21 responses to “दूषित आहार से क्रूर मनोवृति

  1. विरेन्द्र सिंह चौहान

    15/11/2010 at 6:43 अपराह्न

    मैं आपसे सहमत हूँ. सार्थक लेख.

     
  2. M VERMA

    15/11/2010 at 7:17 अपराह्न

    सार्थक और प्रभावी आलेख

     
  3. महेन्द्र मिश्र

    15/11/2010 at 7:31 अपराह्न

    बहुत ही सार्थक और प्रेरणास्पद आलेख …

     
  4. सुज्ञ

    15/11/2010 at 9:37 अपराह्न

    विरेंद्र जी,एम वर्मा जी,महेंद्र जी,आपने करूणा को प्रोत्साहित किया है। आभार

     
  5. DR. ANWER JAMAL

    16/11/2010 at 10:13 पूर्वाह्न

    स्वामी विवेकानंद ने पुराणपंथी ब्राह्मणों को उत्साहपूर्वक बतलाया कि वैदिक युग में मांसाहार प्रचलित था . जब एक दिन उनसे पूछा गया कि भारतीय इतिहास का स्वर्णयुग कौन सा काल था तो उन्होंने कहा कि वैदिक काल स्वर्णयुग था जब "पाँच ब्राह्मण एक गाय चट कर जाते थे ." (देखें स्वामी निखिलानंद रचित 'विवेकानंद ए बायोग्राफ़ी' प॰ स॰ 96)€ @ अमित जी, क्या अपने विवेकानंद जी की जानकारी भी ग़लत है ?या वे भी सैकड़ों यज्ञ करने वाले आर्य राजा वसु की तरह असुरोँ के प्रभाव में आ गए थे ?2- ब्राह्मणो वृषभं हत्वा तन्मासं भिन्न भिन्नदेवताभ्यो जुहोति .ब्राह्मण वृषभ (बैल) को मारकर उसके मांस से भिन्न भिन्न देवताओं के लिए आहुति देता है .-ऋग्वेद 9/4/1 पर सायणभाष्य सायण से ज्यादा वेदों के यज्ञपरक अर्थ की समझ रखने वाला कोई भी नहीं है . आज भी सभी शंकराचार्य उनके भाष्य को मानते हैं । Banaras Hindu University में भी यही पढ़ाया जाता है ।क्या सायण और विवेकानंद की गिनती कुक्कुरों , पशुओं और असुरों में करने की धृष्टता क्षम्य है ?

     
  6. सुज्ञ

    16/11/2010 at 1:00 अपराह्न

    अनवर साहब,यह टिप्पणी यहाँ असबद्ध है, पर जहां यह पुछी गई है वहीं से प्रत्युत्तरों का सार प्रस्तूत करता हूँ। विशेष कर पाठको के लिये।1-क्या अपने विवेकानंद जी की जानकारी भी ग़लत है ?पहले तो कथन अन्य लेखक(स्वामी निखिलानंद) उस पर भी बायोग्राफ़ी से लिया गया है। ऐसा कहो कि 'स्वामी निखिलानंद जी'की जानकारी गलत है। अब यदि वाकई विवेकानंद जी का यह आशय था तो यह भी सत्य है कि स्वामी विवेकानंद स्वयं गोमांस भक्षक थे। और हमेशा विद्वान यह कहते आये है कि वेदो में हिंसा और मांस भक्षण की मिथ्या व्याख्या ऐसे ही स्वादलोलुप करते आये है।

     
  7. सुज्ञ

    16/11/2010 at 1:04 अपराह्न

    अनवर साहब,2-ब्राह्मणो वृषभं हत्वा तन्मासं भिन्न भिन्नदेवताभ्यो जुहोति .ब्राह्मण वृषभ (बैल) को मारकर उसके मांस से भिन्न भिन्न देवताओं के लिए आहुति देता है .-ऋग्वेद 9/4/1 पर सायणभाष्य **जिससे सत्य अर्थ का भान हो जाता है. जहाँ द्वयर्थक शब्दों के कारण भ्रम होने की संभावना है, वहाँ बहुतेरे स्थलों पर स्वयं वेदभगवान ने ही अर्थ का स्पस्थिकरण कर दिया है—-"धाना धेनुरभवद वत्सोsस्यास्तिल:" ( अथर्ववेद १८/४/३२ ) — अर्थात धान ही धेनु है और तिल ही उसका बछडा हुआ है ."ऋषभ" एक प्रकार का कंद है; इसकी जद लहसुन से मिलती जुलती है. सुश्रतु और भावप्रकाश आदि में इसके नाम रूप गुण और पर्यायों का विशेष विवरण दिया गया है . ऋषभ के – वृषभ, वीर, विषाणी, वृष, श्रंगी, ककुध्यानआदि जितने भी नाम आये है, सब बैल का अर्थ रखते है. इसी भ्रम से "वृषभमांस" की वीभत्स कल्पना हुयी हुई है, जो "प्रस्थं कुमारिकामांसम" के अनुसार 'एक सेर कुमारी कन्या के मांस' की कल्पना से मेल खाती है. वैध्याक ग्रंथों में बहुत से पशु पक्षियों के नाम वाले औषध देखे जाते है. ——- वृषभ ( ऋषभकंद ), श्वान ( ग्रंथिपर्ण या कुत्ता घास) , मार्जार ( चित्ता), अश्व ( अश्वगंधा ), अज (आजमोदा), सर्प (सर्पगंधा), मयूरक (अपामार्ग), कुक्कुटी ( शाल्मली ), मेष (जिवाशाक), गौ (गौलोमी ), खर (खर्परनी) .यहाँ यह भी जान लेना चहिये की फलों के गुदे को "मांस", छाल को "चर्म", गुठली को "अस्थि" , मेदा को "मेद" और रेशा को "स्नायु" कहते है ——– सुश्रुत में आम के प्रसंग में आया है—-"अपक्वे चूतफले स्न्नायवस्थिमज्जानः सूक्ष्मत्वान्नोपलभ्यन्ते पक्वे त्वाविभुर्ता उपलभ्यन्ते ।।"'आम के कच्चे फल में सूक्ष्म होने के कारण स्नायु, हड्डी और मज्जा नहीं दिखाई देती; परन्तु पकने पर ये सब प्रकट हो जाती है.' -अमित शर्मा

     
  8. सुज्ञ

    16/11/2010 at 1:18 अपराह्न

    3-सायण से ज्यादा वेदों के यज्ञपरक अर्थ की समझ रखने वाला कोई भी नहीं है . आज भी सभी शंकराचार्य उनके भाष्य को मानते हैं । Banaras Hindu University में भी यही पढ़ाया जाता है ।## किसी भी भाष्य को किसी द्वारा मानने का तात्पर्य यह नहिं है कि उसके प्रत्येक अक्षर को अक्षरशः बिना विवेक के स्वीकार कर लिया।जिस भी बात का सत्य अनुशीलन हुआ है वह सही हैविवेकवान यह करता है— तत्व और तथ्य:सच्चा सो मेरा, जो सच्चा नहिं मेरा नहिं।

     
  9. सुज्ञ

    16/11/2010 at 1:30 अपराह्न

    अनवर साहब,सारे प्रश्न घुमा-फिरा कर एक ही आश्य के है, विवेक-बुद्धि लगाओ तो उत्तर तो मिल चुके है। खूब जानते है, आपको भ्रम है कि ये महापुरूषों की आलोचना न कर पाएंगे।4- शंकराचार्य जी और विवेकानंद जी के ज्ञान को नकार कर अपना घर कैसे बचा पाएँगे आप ?जिसने शंकराचार्य जी और विवेकानंद जी का घर आबाद ( ज्ञान व कीर्ती)दी, वे वेद सलामत है। शास्वत है। फिर बचाने की बात छोडो घर पहले से ही बुलंद है। बुलंद रहेगा।

     
  10. DR. ANWER JAMAL

    16/11/2010 at 1:49 अपराह्न

    शंकराचार्य जी और विवेकानंद जी के ज्ञान को नकार कर धर्म के मूल रूप को कैसे पहचान पाएँगे आप ? @ सुज्ञ जी, कृप्या मूल प्रश्न का जवाब स्पष्ट दें कि क्या सायण और विवेकानंद की गिनती कुक्कुरों , पशुओं और असुरों में करने की धृष्टता क्षम्य है ?

     
  11. सुज्ञ

    16/11/2010 at 1:58 अपराह्न

    @ सुज्ञ जी, कृप्या मूल प्रश्न का जवाब स्पष्ट दें किक्या सायण और विवेकानंद की गिनती कुक्कुरों , पशुओं और असुरों में करने की धृष्टता क्षम्य है ?अनवर जी,क्या बात करते हो????????, ऐसा कहा????? नाम लेकर…… किसने??? किस धृष्ट पशु कुक्कर नें यह प्रश्न वाक्य बनाया है? मूल वाक्य कहां है?

     
  12. DR. ANWER JAMAL

    16/11/2010 at 2:08 अपराह्न

    इंशा अल्लाह , वैदिकों का घर बुलंद नहीं भी होगा तो अब हो जाएगा लेकिन @ सुज्ञ जैन जी ! आप काहे 'खुस' हो रहे हैं जैन समाज की जनसंख्या तो लगातार गिरती ही जा रही है ।अपने समाज के क्षरण और अंत को रोकने की क्या योजना और नीति है आपके पास या फिर आप यूँ ही वैदिकों की बुलंदी के जयघोष करते हुए दूसरों के साथ खुद को भी भ्रमाते रहेँगे ?

     
  13. सुज्ञ

    16/11/2010 at 3:16 अपराह्न

    अनवर साहब,जैन दृष्टि के लिहाज से वैदिक ही नहिं, समस्त जगत के जीव भी उनके अपने है।आपकी सोच आप पर हावी है,जैन समाज, जैन धर्म के लिये जनसंख्यावृद्धि में नहिं मानता,Quantity नहिं Quality में मानता है। कोई भी जन्म से जैन नहिं होता। वो कोई भी किसी भी धर्मलेबल में बैठा व्यक्ति अगर सम्यग अहिंसा का पालन करता है, तो स्वमभू बोधित होकर सत्य मार्ग पा सकता है।जनसंख्या से संसार पर कब्जा पाने मंशा आपको मुबारक, जैन दर्शन में संसार त्याग की बात होती है। फ़िर समाज के क्षरण और अंत को रोकने की क्या योजना और नीति की क्या आवश्यकता?वैदिक और जैन एक ही है, मात्र मत-भिन्नता से अलग पहचान बनी है, वैदिक मानते है पहले सब वैदिक थे जैन उसमें से निकले, जैन मानते है पहले सभी जैन थे वैदिक उसमें से निकले। पर जो भी हो इससे यह तो निश्चित हो गया हम एक है। वे अहिंसा की बात करते है तब मैं बिना भ्रम उनकी बुलंदी का जयघोष करूंगा।और करूणावान लोगों की चरण-पूजा करूंगा।

     
  14. सुज्ञ

    16/11/2010 at 3:29 अपराह्न

    अनवर साहब,मैने आपके ब्लाग पर भी अहिंसा का दृष्टिकोण जानने के लिये चर्चा की थी। यदि मैं इसलाम में भी अहिंसा पूर्ण (जीवमात्र के प्रति)शिद्दत से पाता तो मैं इस्लाम का भी जयघोष करता। लेकिन आपसे बहस के दौरान स्पष्ठ हो गया कि हिंसा नहिं तो इस्लाम नहिं, दोनो एक ही सिक्के के दो पहलू है। फिर भी जो कोई भी इस्लाम में रहते हुए भी अहिंसावृति अपनाता है,जीवों (मनुष्यों सहित) के प्रति अनुकंपा भाव लाता है,सच्चे अर्थों में करूणावान बनता है, मै उसकी (आत्मन) जय-जयकार करूंगा

     
  15. पं.डी.के.शर्मा"वत्स"

    16/11/2010 at 4:39 अपराह्न

    शक्यो वारयितुं जलेन हुतभुक्छत्रेण सूर्यातपो नागेन्द्रो निशिताङ्कुशेन समदो दण्डेन गोगर्दभौ।व्याधिर्भेषजसङ्ग्रहैश्च विविधैर्मन्त्रप्रयोगैर्विषं सर्वस्यौषधमस्तिशास्त्रविहितं मूर्खस्य नास्त्यौषधम्।।जल से अग्नि बुझाया जा सकता है, सूर्य के ताप को छाते से रोका जा सकता है, मतवाले हाथी को तीखे अंकुश से वश में किया जा सकता है, पशुओं को दण्ड से वश में किया जा सकता है, औषधियों से रोगों को भी शान्त किया जा सकता है, विष को भी अनेक मन्त्रों के प्रयोगों से आप उतार सकते हैं – इस तरह सब उपद्रवों की औषधि शास्त्र में है,परन्तु मूर्खों, दुराग्रहियों की किसी शास्त्र में कोई औषधि नहीं है….मूर्खता का इससे बडकर प्रमाण भला क्या होगा कि आलेख की मूल भावना एवं विषय् से इतर ये स्वनामधन्य लोग अपनी ही हाँकने में लगे हैं.कुछ ओर न मिला तो अब "जैन समाज" की रामकहानी ले बैठे.अब तो हमारी ये धारणा पुख्ता होने लगी है कि इन्सान की शिक्षा का उसकी बुद्धि से कैसा भी कोई सरोकार नहीं है. पढ लिखकर भी कुछ लोग जीवन भर मूर्ख के मूर्ख ही बने रहते हैं……..

     
  16. सुज्ञ

    16/11/2010 at 5:05 अपराह्न

    पंडित जी,बहुत बहुत आभार आपका, आपके आने मात्र से संबल मिलता है।

     
  17. अमित शर्मा

    16/11/2010 at 8:21 अपराह्न

    ओहो पता नहीं इस ब्लॉग की फोलोविंग किस तरह छूट गयी थी…………..इन दिनों ब्लोगिंग छूट जाने से ना जाने क्या क्या छूट गया………..सुज्ञ जी बहुत बढिया लेख है.

     
  18. अमित शर्मा

    16/11/2010 at 8:34 अपराह्न

    जमाल साहब गीताजी के "दैवासुरसंपत्तिविभागयोगः" नामक सोलवें अध्याय में वर्णित असुर प्रकृति के सारे मानव मेरी नजर में कुक्कुर है, चाहे फिर उस प्रकृति के लक्षण मेरे अन्दर ही क्यों ना विद्यमान हो. अब इस कसोटी पर आपको जिसे भी कसना हो कस लीजिये.

     
  19. एस.एम.मासूम

    16/11/2010 at 10:08 अपराह्न

    जो शाकाहारी है उनके लिए एक बेहतरीन लेख़. जो मांसाहारी हैं उनका सहमत ना होना कोई अजीब बात नहीं. यह अवश्य ग़लत है की आप किसी मांसाहारी या शाकाहारी के धर्म को निशाना बनाएं. या केवल इसलिए किसी इंसान से नफरत करें क्योंकि वोह मांसाहारी है.

     
  20. सुज्ञ

    16/11/2010 at 10:23 अपराह्न

    मासूम साहब,जिस प्रकार जो मांसाहारी हैं उनका सहमत ना होना कोई अजीब बात नहीं.उसी तरह शाकाहारीओं के लिये मांसाहारीओं से सहमत होना गैर जरूरी है। और असहमति कोई वैर नहिं है।

     

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