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खाना खाना और खाना ही मात्र जिन्दगी नहीं। (आहार संयम)

12 नवम्बर

मानव को उर्ज़ा पाने के लिये भोजन करना आवश्यक है, और इसमें भी दो मत नहिं कि मनुष्य को जीवित रहने के लिये अन्य जीवों पर आश्रित रहना ही पडता है। लेकिन, सृष्टि का सबसे बुद्धिमान प्राणी होने के नाते, दूसरे जीवों के प्रति उत्तरदायित्व पूर्वक सोचना भी, मानव का कर्तव्य है। इसलिये वह अपना भोजन प्रबंध कुछ इस प्रकार करे कि, आहार की इच्छा होने से लेकर, ग्रहण करने तक, सृष्टि की जीवराशी कम से कम खर्च हो। हिंसा तो वनस्पतिजन्य आहार में भी सम्भव है, लेकिन इसका यह तात्पर्य नहिं कि जब सभी तरह के आहार में हिंसा है, तो जानबुझ कर सबसे क्रूरत्तम हिंसा ही अपनाई जाय। यहाँ हमारा विवेक कहता है, जितना हिंसा से बचा जाये, बचना चाहिये।

हमें यह न भुलना चाहिए, कि एक समान दिखने वाले कांच और हीरे के मूल्य में अंतर होता है। और वह अंतर उनकी गुणवत्ता के आधार पर होता है। उसी प्रकार एक बकरे के जीव और एक केले के जीव के जीवन-मूल्य में भी अंतर तो है ही।

आहार का चुनाव करते समय हमें अपने विवेक को वैज्ञानिक अभिगम देना होगा। वैज्ञानिक दृष्टिकोण है कि सृष्टि में जीवन विकास, सुक्षम एकेन्द्रिय जीव से प्रारंभ होकर क्रमशः पंचेंद्रिय तक पहुँचा है। ऐसे में यदि हमारा जीवन कम से कम विकसित जीवो (एकेन्द्रिय जीव) की हिंसा से चल सकता है तो हमें कोई अधिकार नहिं हम उससे अधिक विकसित जीवों की अनावश्यक हिंसा करें। विकास के दृष्टिकोण से विकसित ( पशु) की हिंसा, प्रकृति के साथ जघन्य अपराध है।

प्रकृति और अर्थशास्त्र का यह सिद्धांत है कि संसाधनो का विवेक पूर्वक ज्यादा से ज्यादा दक्षता से उपभोग किया जाय। मानव के पास ही वह बुद्धिमत्ता है कि वह उपलब्ध संसाधनो का सर्वोत्तम प्रबंध करे। अर्थार्त कम से कम संसाधन खर्च कर अधिक से अधिक उसका लाभ प्राप्त करे।

जीव की इन्द्रियां उसके सुख दुख महसुस करने के माध्यम भी होती है, जो जीव जितनी भी इन्द्रियों की योगयता वाला है, उसे हिंसा के समय इतनी ही अधिक इन्द्रियों के माध्यम से पीडा पहुँचेगी, अर्थार्त पांचो ही इन्द्रिय धारक जीव को अधिक पीडा पहुँचेगी जो मानव मन में क्रूर भावों की उत्पत्ती का माध्यम बनेगी।

मांस में केवल एक जीव का ही प्रश्न नहिं, जब जीव की मांस के लिये हत्या की जाती है, तो जान निकलते ही मक्खियां करोडों अंडे उस मुर्दे पर दे जाती है, पता नहीं जान निकलनें का एक क्षण में मक्खिओं को कैसे आभास हो जाता है, उसी क्षण से वह मांस मक्खिओं के लार्वा का भोजन बनता है, जिंदा जीव के मुर्दे में परिवर्तित होते ही असंख्य सुक्ष्म जीव उस मुर्दा मांस में पैदा हो जाते है। और जहां यह तैयार होता है, वे बुचड्खाने व बाज़ार रोगाणुओं के घर होते है, और यह रोगाणु भी जीव ही होते है। यानि ताज़ा मांस के टुकडे पर ही लाखों मक्खी के अंडे, लाखों सुक्ष्म जीव और लाखों रोगाणु होते है। इतना ही नहिं पकने के बाद भी मांस में जीवोत्पती निरंतर जारी रहती है। इसलिये, एक जीव का मांस होते हुए भी, संख्या के आधार पर अनंत जीवहिंसा का कारण बनता है।

जीवन जीने की हर प्राणी में अदम्य इच्छा होती है, यहां तक कि कीट व जंतु भी कीटनाशक दवाओं के खिलाफ़ प्रतिकार शक्ति उत्पन्न कर लेते है। सुक्ष्म जीवाणु-रोगाणु भी कुछ समय बाद रोगप्रतिरोधक दवाओं के विरुद्ध जीवन बचाने के तरिके खोज लेते है। यह उनके जीनें की अदम्य जीजिविषा का परिणाम होता है, सभी जीना चाह्ते है मरना कोई नहिं चाहता। फिर प्राण बचाने को संघर्षरत पशुओं को मात्र स्वाद के लिये मार खाना तो क्रूरता की पराकाष्ठा है।

येन केन पेट भरना ही मानव का लक्षय नहिं है। यह तो पशुओं का लक्षण है। प्रकृति प्रदत्त बुद्धि से ही हमने सभ्यता साधी। यही बुद्धि हमें यह विवेकशीलता भी प्रदान करती है, कि हमारे विचार और व्यवहार सौम्य व पवित्र बने रहे। हिंसाजन्य आहार लेने से, हिंसा के प्रति सम्वेदनाएं समाप्तप्राय हो जाती है। किसी दूसरे जीव के प्रति दया करूणा के भाव नष्ट हो जाते है। अनावश्यक हिंसा-भाव मन में रूढ हो जाता है, और हमारे आचरण में क्रूरता समाहित हो जाती है। ऐसी मनोदशा में, प्रतिकूलता उपस्थित होनें पर आवेश में, हिंसक कृत्य होना भी सम्भव है। आहार इसी तरह हमारे विचारों को प्रभावित करता है।

हमारी सम्वेदनाओं और अनुकंपा भाव की रक्षा के लिये, व विचार और वर्तन को विशुद्ध रखनें के लिये शाकाहार ही हमारी पसंद होना चाहिए। और फ़िर जहां और जब तक हमें सात्विक पौष्ठिक शाकाहार, प्रचूरता से उपलब्ध है, वहां तो हमें जीवों को करूणा दान, अभयदान दे देना ही श्रेयस्कर है।

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13 responses to “खाना खाना और खाना ही मात्र जिन्दगी नहीं। (आहार संयम)

  1. भारतीय नागरिक - Indian Citizen

    12/11/2010 at 9:07 अपराह्न

    हम तो पहले से ही शाकाहारी हैं… बड़े बड़े लोगों ने डिगाने की कोशिश की, लेकिन डिगे नहीं…

     
  2. संगीता स्वरुप ( गीत )

    12/11/2010 at 10:58 अपराह्न

    अच्छा सन्देश देती पोस्ट

     
  3. ZEAL

    13/11/2010 at 9:09 पूर्वाह्न

    मैं भी शाकाहार के पक्ष में हूँ। "जैसा खाए अन्न , वैसा बने मन "

     
  4. देवेन्द्र पाण्डेय

    13/11/2010 at 10:01 पूर्वाह्न

    ..जान निकलते ही मक्खियां करोडों अंडे उस मुर्दे पर दे जाती है, पता नहीं जान निकलनें का एक क्षण में मक्खिओं को कैसे आभास हो जाता है, उसी क्षण से वह मांस मक्खिओं के लार्वा का भोजन बनता है, जिंदा जीव के मुर्दे में परिवर्तित होते ही असंख्य सुक्ष्म जीव उस मुर्दा मांस में पैदा हो जाते है। और जहां यह तैयार होता है, वे बुचड्खाने व बाज़ार रोगाणुओं के घर होते है, और यह रोगाणु भी जीव ही होते है। यनि ताज़ा मांस के टुकडे पर ही हज़ारों मक्खी के अंडे, हज़ारो सुक्ष्म जीव और हज़ारों रोगाणु होते है। इतना ही नहिं पकने के बाद भी मांस में जीवोत्पती निरंतर जारी रहती है…..भयावह दृष्य।

     
  5. सुज्ञ

    13/11/2010 at 3:20 अपराह्न

    भारतीय नागरिक जी,संगीताजी दीदी,दिव्या जी,सात्विक शाकाहार के आधार पर अहिंसा को प्रोत्साहन देने के लिये आभार।

     
  6. सुज्ञ

    13/11/2010 at 3:28 अपराह्न

    देवेन्द्र पाण्डेय जी,अहिंसा के भाव को स्पर्श करने का आभार।भयावह ही नहिं जगुप्सा प्रेरक है यह, एक जीव के साथ ही अनंत जीवों के प्रति ह्रदय में करूणा उत्पन्न होती है।

     
  7. मनोज कुमार

    13/11/2010 at 4:35 अपराह्न

    कुछ लोग खाने के लिए ही जीते हैं, जबकि कुछ लोग जीने के लिए खाते हैं। दूसरे तरह के लोग निश्चय ही चुनाव कर आहार ग्रहण करते हैं।

     
  8. सुज्ञ

    13/11/2010 at 5:37 अपराह्न

    आज ही मैने किसी ब्लोग पर पढा……"इन लोगों का कलिमा यह है -जीव को मारना पाप है और जीव की रक्षा करना पुण्य है।killing a sensation is sin and vice versa .यह एक मनघड़त कल्पना है। इसकी कोई बुनियाद न तो प्रकृति के नियमों में है और न विज्ञान की दरयाफ़्तों में। यह नज़रिया पूरी तरह एक अप्राकृतिक नज़रिया है।"॰॰॰जीवों को बचाना अप्राकृतिक है? फ़िर प्राकृतिक रूप से तो मानव मानव को ही मार कर खा जाता था, वह अधिक प्राकृतिक था? वाह रे बुद्दि का दिवाला!!! अब समझे हिंसा की विचारधारा कहाँ से प्रकट होती है। और क्या परिणाम लाती है।

     
  9. डॉ॰ मोनिका शर्मा

    14/11/2010 at 7:43 पूर्वाह्न

    जी आपकी इस पोस्ट का हर शब्द शुरू से लेकर आखिरी तक शांत मन से पढ़ा…… समझा… कमाल का विषय चयन आज की असंवेदनशील ज़िन्दगी में आहार के विषय में यह सार्थक जानकारी ज़रूरी है…… बहुत ख़ुशी है इस बात की कि मैं शुद्ध शाकाहारी हूँ…….

     
  10. Alok Mohan

    14/11/2010 at 12:22 अपराह्न

    क्या करे कुछ खाने के लिए जीते हैफलो और शाकाहार से इनका मन तो भरता नही इसलिएअपने स्वाद के लिए निरीह जानवरों की हत्या कर रहे है

     
  11. सुज्ञ

    14/11/2010 at 2:13 अपराह्न

    डॉ॰ मोनिका जी शर्मा,जीवों के प्रति अनुकम्पा का भाव ही अहिंसा का आधार है, अहिंसा आहार से ही प्रारंभ होती है,और आहार हमारी प्रथम और आवश्यक जरूरत। इसलिये अहिंसक गुण भी आहार से ही प्रारंभ होता है।इस लिये जीवदया सहित आहार ग्रहण करना हमारा विवेक है। शाकाहारी रहकर आप जाने- अनजाने ही असंख्य जीवों को अभयदान दे चुके है, दे रहे है और देंगे भी।मैं नमन करता हूँ इस सात्विक भाव को।

     
  12. दिगम्बर नासवा

    14/11/2010 at 6:12 अपराह्न

    सच है तभी तो कहा है … जैसा आहार …. वैसा व्यवहार … बहुत स्पष्ट विवेचना करती पोस्ट …

     
  13. सुज्ञ

    14/11/2010 at 6:44 अपराह्न

    जी नासवा जी,यहां तक कि जैसा अन्न वैसा मन। यदि अनिति से अर्जित अन्न का प्रयोग करने मात्र से मन प्रभावित हो सकता है तो क्रूरता से उत्पन्न अभक्ष्य से क्रूर विचारधारा सम्भव क्यों नहिं।

     

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ज्ञानदत्त पाण्डेय का हिन्दी ब्लॉग। मैं गाँव विक्रमपुर, जिला भदोही, उत्तरप्रदेश, भारत में रह कर ग्रामीण जीवन जानने का प्रयास कर रहा हूँ। ज़ोनल रेलवे के विभागाध्यक्ष के पद से रिटायर रेलवे अफसर।

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