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द्वेष की गांठें,क्रोध की गठरी

10 नवम्बर

द्वेष रूपी गांठ बांधने वाले, जीवन भर क्रोध की गठरी सिर पर उठाए घुमते है। यदि द्वेष की गांठे न बांधी होती तो क्रोध की गठरी खुलकर बिखर जाती, और सिर भारमुक्त हो जाता।
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3 responses to “द्वेष की गांठें,क्रोध की गठरी

  1. अनामिका की सदायें ......

    10/11/2010 at 9:30 अपराह्न

    असरदार, लाजवाब. विचारणीय.

     
  2. सुज्ञ

    11/11/2010 at 10:18 पूर्वाह्न

    अनामिका जी,धन्यवाद!!

     
  3. ZEAL

    11/11/2010 at 4:43 अपराह्न

    बहुत गहरी बात !

     

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ज्ञानदत्त पाण्डेय का हिन्दी ब्लॉग। मैं यह ब्लॉग लिखने के अलावा गाँव विक्रमपुर, जिला भदोही, उत्तरप्रदेश, भारत में रह कर ग्रामीण जीवन जानने का प्रयास कर रहा हूँ। रेलवे से ज़ोनल रेलवे के विभागाध्यक्ष के पद से रिटायर्ड अफसर।

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