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सोते सोते ही निकल गई सारी जिन्दगी

30 अक्टूबर
हाथोंहाथ तूं दुख खरीद के, सुख सारे ही खोता।
कर्ज़, फ़र्ज और मर्ज़ बहाने, जीवन बोझा ढोता।
ढोते ढोते ही निकल गई सारी जिन्दगी॥
शाम पडे बंदे रे तूं, रोज के पाप न धोता।
चिंता जब असह्य बने तो, चद्दर तान के सोता।
सोते सोते ही निकल गई सारी जिन्दगी॥
जन्म लेते ही इस धरती पर, तुने रूदन मचाया।
आंख अभी तो खुल ना पाई, भूख भूख चिल्लाया॥
खाते खाते ही निकल गई सारी जिन्दगी॥
बचपन खोया खेल कूद में, योवन पा गुर्राया।
धर्म-कर्म का मर्म न जाने, विषय-भोग मन भाया।
भोगों भोगों में निकल गई सारी जिन्दगी॥
धीरे धीरे आया बुढापा, डगमग डोले काया।
सब के सब रोगों ने देखो, डेरा खूब जमाया।
रोगों रोगों में निकल गई सारी जिन्दगी॥
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8 responses to “सोते सोते ही निकल गई सारी जिन्दगी

  1. M VERMA

    30/10/2010 at 5:23 अपराह्न

    भोग के बाद रोग ही मिलेगा

     
  2. ZEAL

    30/10/2010 at 5:33 अपराह्न

    .लड़कपन खेल में खोया,जवानी भर मैं खूब सोया।बुढ़ापा देख कर रोया.

     
  3. सलीम ख़ान

    30/10/2010 at 5:34 अपराह्न

    YAQEENANलड़कपन खेल में खोया,जवानी भर मैं खूब सोया।बुढ़ापा देख कर रोया!

     
  4. Arvind Mishra

    30/10/2010 at 6:58 अपराह्न

    आपकी उम्र क्या है अभी ?

     
  5. सुज्ञ

    30/10/2010 at 7:42 अपराह्न

    अरविंद जी,अन्तिम छंद🙂

     
  6. mohinuddin

    31/10/2010 at 1:33 अपराह्न

    bhut khub mzaa aa gyaa.

     
  7. संजय भास्कर

    01/11/2010 at 1:40 अपराह्न

    बहुत रोचक ..उम्दा रचना

     
  8. Archana

    03/11/2010 at 2:49 अपराह्न

    बहुत ही बढिया…रिकार्ड कर लिया है…

     

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ज्ञानदत्त पाण्डेय का हिन्दी ब्लॉग। मैं यह ब्लॉग लिखने के अलावा गाँव विक्रमपुर, जिला भदोही, उत्तरप्रदेश, भारत में रह कर ग्रामीण जीवन जानने का प्रयास कर रहा हूँ। रेलवे से ज़ोनल रेलवे के विभागाध्यक्ष के पद से रिटायर्ड अफसर।

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