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सोते सोते ही निकल गई सारी जिन्दगी

27 अक्टूबर
हाथोंहाथ तूं दुख खरीद के, सुख सारे ही खोता।
कर्ज़, फ़र्ज और मर्ज़ बहाने, जीवन बोझा ढोता।
ढोते ढोते ही निकल गई सारी जिन्दगी॥
जन्म लेते ही इस धरती पर, तुने रूदन मचाया।
आंख भी तो खुल ना पाई, भूख भूख चिल्लाया॥
खाते खाते ही निकल गई सारी जिन्दगी॥
बचपन खोया खेल कूद में, योवन पा गुर्राया।
धर्म-कर्म का मर्म न जाने, विषय-भोग मन भाया।
भोगों भोगों में निकल गई सारी जिन्दगी॥
शाम पडे रोज रे बंदे, पाप-पंक नहीँ धोता।
चिंता जब असह्य बने तो, चद्दर तान के सोता।
सोते सोते ही निकल गई सारी जिन्दगी॥
धीरे धीरे आया बुढापा, डगमग डोले काया।
सब के सब रोगों ने देखो, डेरा खूब जमाया।
रोगों रोगों में निकल गई सारी जिन्दगी॥
_________________________________________________
 

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18 responses to “सोते सोते ही निकल गई सारी जिन्दगी

  1. well wisher

    27/10/2010 at 9:23 अपराह्न

    इससे निजी और पारिवारिक संबंधों पर भी बुरा असर पड़ता है।

     
  2. भारतीय नागरिक - Indian Citizen

    27/10/2010 at 10:02 अपराह्न

    इस टिप्पणी को एक ब्लॉग व्यवस्थापक द्वारा हटा दिया गया है.

     
  3. Patali-The-Village

    27/10/2010 at 10:28 अपराह्न

    बहुत अच्छी….

     
  4. संगीता पुरी

    27/10/2010 at 10:42 अपराह्न

    वाह सुज्ञ जी .. बहुत खूब !!

     
  5. Shah Nawaz

    27/10/2010 at 10:54 अपराह्न

    बेहतरीन लिखा है सुज्ञ भाई.

     
  6. Arvind Mishra

    27/10/2010 at 11:09 अपराह्न

    दुःख ही जीवन की कथा रही -क्या कहूं जो अब तक नहीं कही -निराला !

     
  7. abhishek1502

    28/10/2010 at 12:37 पूर्वाह्न

    उत्तम कोटि का सन्देश हम तो ये विचार ही नही करते की हमारे पास निश्चित समय है .उस का सदुपयोग न किया तो पछतावे से सिवा हाथ कुछ न लगेगा और अपनी ही दुनिया में खोए रहते है और जब कोई जगता है तो ये वही शब्द है जो संभवतः उस के मुख से निकलते होंगे

     
  8. देवेन्द्र पाण्डेय

    28/10/2010 at 8:30 पूर्वाह्न

    ..सुंदर आध्यात्मिक चिंतन।..बहुत अच्छा लिखा है आपने।

     
  9. Majaal

    28/10/2010 at 9:37 पूर्वाह्न

    kehte bhi hai, duniya mein sabse pechida aur dilchasp kaam hai jindagi mein se jeevan nikaalana…likhate rahiye …

     
  10. सुज्ञ

    28/10/2010 at 10:58 पूर्वाह्न

    यह टिप्पणी भूलवश डिलिट हो गई, पुनः प्रस्तूतभारतीय नागरिक – Indian Citizen ने आपकी पोस्ट " सोते सोते ही निकल गई सारी जिन्दगी " पर एक टिप्पणी छोड़ी है:बढ़िया…

     
  11. क्षितिजा ....

    28/10/2010 at 11:04 पूर्वाह्न

    जन्म लेते ही इस धरती पर, तुने रूदन मचाया।आंख अभी तो खुल ना पाई, भूख भूख चिल्लाया॥खाते खाते ही निकल गई सारी जिन्दगी॥बहुत सुंदर रचना ….

     
  12. शारदा अरोरा

    28/10/2010 at 12:20 अपराह्न

    बहुत काम का और बढ़िया लिखा है

     
  13. Kailash C Sharma

    28/10/2010 at 1:36 अपराह्न

    वास्तव में जिंदगी इसी तरह निकल जाती है और हम सोचते हुए भी कुछ नहीं कर पाते…जिंदगी के यथार्थ का सुन्दर चित्रण…

     
  14. संगीता स्वरुप ( गीत )

    28/10/2010 at 2:30 अपराह्न

    बह ज़िंदगी इसी में निकाल दी कटी है ..जागरूक स करने वाली रचना ..

     
  15. कुमार राधारमण

    28/10/2010 at 6:28 अपराह्न

    आम आदमी ऐसे ही जीता है-तमाम लालसाएं लिए,असंतुष्ट,दुनिया भर से शिकायत करता हुआ। जीवन-सूत्र।

     
  16. एस.एम.मासूम

    28/10/2010 at 7:59 अपराह्न

    अति सुंदर सुज्ञ जी

     
  17. चला बिहारी ब्लॉगर बनने

    28/10/2010 at 8:05 अपराह्न

    हंसराज जी! जीवन का सार समझा दिया इस कविता में!!

     
  18. Madan Mohan saxena

    31/07/2013 at 3:59 अपराह्न

    अति सुंदर , कविता में जीवन का सार .

     

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ज्ञानदत्त पाण्डेय का हिन्दी ब्लॉग। मैं यह ब्लॉग लिखने के अलावा गाँव विक्रमपुर, जिला भदोही, उत्तरप्रदेश, भारत में रह कर ग्रामीण जीवन जानने का प्रयास कर रहा हूँ। रेलवे से ज़ोनल रेलवे के विभागाध्यक्ष के पद से रिटायर्ड अफसर।

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