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चीर कर कठिनाईयों को, दीप बन हम जगमगाएं…… प्रार्थना

25 अक्टूबर
॥लक्ष्य॥

लक्ष्य है उँचा हमारा, हम विजय के गीत गाएँ।
चीर कर कठिनाईयों को, दीप बन हम जगमगाएं॥

तेज सूरज सा लिए हम, ,शुभ्रता शशि सी लिए हम।
पवन सा गति वेग लेकर, चरण यह आगे बढाएँ॥

हम न रूकना जानते है, हम न झुकना जानते है।
हो प्रबल संकल्प ऐसा, आपदाएँ सर झुकाएँ॥

हम अभय निर्मल निरामय, हैं अटल जैसे हिमालय।
हर कठिन जीवन घडी में फ़ूल बन हम मुस्कराएँ॥

हे प्रभु पा धर्म तेरा, हो गया अब नव सवेरा।
प्राण का भी अर्ध्य देकर, मृत्यु से अमरत्व पाएँ॥

 -रचनाकार: अज्ञात

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16 responses to “चीर कर कठिनाईयों को, दीप बन हम जगमगाएं…… प्रार्थना

  1. Sunil Kumar

    25/10/2010 at 5:53 अपराह्न

    हम न रूकना जानते है, हम न झुकना जानते है।हो प्रबल संकल्प ऐसा, आपदाएँ सर झुकाएँ॥yahi vichar hamare man men hona chahiye .bahut sundar

     
  2. Gourav Agrawal

    25/10/2010 at 6:43 अपराह्न

    "तेज सूरज सा लिए हम, शुभ्रता शशि सी लिए हम।पवन सा गति वेग लेकर, चरण यह आगे बढाएँ॥" सारी प्रकृति के गुण [सूरज,शशि,पवन] साथ है , अब कौन रोकेगा ?🙂 बेहद सुन्दर और ऊर्जावान विचार हैं🙂

     
  3. महेन्द्र मिश्र

    25/10/2010 at 6:54 अपराह्न

    हम न रूकना जानते है, हम न झुकना जानते है ।हो प्रबल संकल्प ऐसा, आपदाएँ सर झुकाएँ ॥बहुत सुन्दर प्रस्तुति…सुज्ञ जी आभार

     
  4. Gourav Agrawal

    25/10/2010 at 6:54 अपराह्न

    @सुज्ञ जी"अज्ञात" कोई "पेन नेम" तो नहीं है ??अब रचनाकार का नाम जानने की रुचि बढ़ रही है🙂

     
  5. सम्वेदना के स्वर

    25/10/2010 at 7:52 अपराह्न

    हंस राज जी! अगर यह किसी अज्ञात कवि की रचना है और यथावत उद्धृत की गई है तब तो ठीक है.किंतु यदि आपने इसे पुनः टाइप किया है तो कठिन और कठिनाई को सुधार लें. पूरी कविता एक स्फूर्ति प्रदान करती है. किसी भी व्यक्ति में इसको पढने के उपरांत अवसाद जाता रहता है! धन्यवाद !

     
  6. सुज्ञ

    25/10/2010 at 8:12 अपराह्न

    सुनील जी,गौरव जी,महेन्द्र जी,बेहद शुक्रिया!!

     
  7. सुज्ञ

    25/10/2010 at 8:17 अपराह्न

    चैतन्य जी,इसे पुनः टाइप किया था, यह मेरी ही ॠटि थी। सुधार लिया गया।मित्र ऐसे ही सदैव इंगित करें, अभी और सहायता की आवश्यकता रहेगी।गौरव जी,रचनाकार को अज्ञात ही दिखाना एक आदेश है।

     
  8. मनोज कुमार

    25/10/2010 at 8:41 अपराह्न

    इस कविता में कुछ ऐसा है जो देर तक सोचने पर मज़बूर करता हईमनोजराजभाषा हिन्दी

     
  9. चला बिहारी ब्लॉगर बनने

    25/10/2010 at 9:14 अपराह्न

    हंसराज जी! बहुत सा ऐसा अज्ञात लोग हैं जो न जाने केतना मोती हमलोग के लिये छोड़ गए हैं… ई कबिता भी अईसा ही एक मोती है.. चैतन्य जी के सलाह पर कबिता में सुधार हो गया है, कृपया शीर्षक भी सुधार लें.. धन्यवाद!

     
  10. भारतीय नागरिक - Indian Citizen

    25/10/2010 at 10:01 अपराह्न

    बहुत प्रभावशाली कविता..

     
  11. पं.डी.के.शर्मा"वत्स"

    26/10/2010 at 2:24 पूर्वाह्न

    "लक्ष्य है उँचा हमारा, हम विजय के गीत गाएँ।चीर कर कठिनाईयों को, दीप बन हम जगमगाएं॥"कहते हैं कि विश्वास मानव मन का सच्चा सेनापति होता है, जो उसकी आत्म क्षमताओं को निरन्तर बढ़ाते हुए उत्साह व आशा को बनाये रखता है…..ये कविता मन के उसी विश्वास को पुख्ता कर रही है……अत्योतम!आभार्!

     
  12. Asha

    26/10/2010 at 6:40 पूर्वाह्न

    एक सुंदर भाव पूर्ण रचना |आशा

     
  13. ZEAL

    26/10/2010 at 12:57 अपराह्न

    बहुत सुन्दर प्रस्तुति !!

     
  14. रचना

    26/10/2010 at 7:01 अपराह्न

    ati sunder abhivyakti

     
  15. अमित शर्मा

    27/11/2010 at 1:57 अपराह्न

    हे प्रभु पा धर्म तेरा, हो गया अब नव सवेरा।प्राण का भी अर्ध्य देकर, मृत्यु से अमरत्व पाएँ॥जय हो !!

     
  16. kunwarji's

    27/11/2010 at 9:41 अपराह्न

    "हम न रूकना जानते है, हम न झुकना जानते है।हो प्रबल संकल्प ऐसा, आपदाएँ सर झुकाएँ॥"aisa hi ho…sabhi ko prerit karti praarthna…kunwar ji,

     

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