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मकान तो बन गया, चलो उसे घर बनाएं

21 अक्टूबर
घर

प्रेम और विश्वास ही घर की नींव है।
स्वावलम्बन ही घर के स्तम्भ है।
अनुशासन व मर्यादा ही घर की बाड़ है।
समर्पण घर की सुरक्षा दीवारें है।
परस्पर सम्मान ही घर की छत है।
अप्रमाद ही घर का आंगन है।
सद्चरित्र ही घर का आराधना कक्ष है।
सेवा सहयोग ही घर के गलियारे है।
प्रोत्साहन ही घर की सीढ़ियां है।
विनय विवेक घर के झरोखे है।
प्रमुदित सत्कार ही घर का मुख्यद्वार है।
सुव्यवस्था ही घर की शोभा है।
कार्यकुशलता ही घर की सज्जा है।
संतुष्ट नारी ही घर की लक्ष्मी है।
जिम्मेदार पुरुष ही घर का छत्र है।
समाधान ही घर का सुख है।
आतिथ्य ही घर का वैभव है।
हित-मित वार्ता ही घर का रंजन है।
_______________________________________
 

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33 responses to “मकान तो बन गया, चलो उसे घर बनाएं

  1. सम्वेदना के स्वर

    21/10/2010 at 6:26 अपराह्न

    हंसराज जी! एक एक सीख यथार्थपरक! मानो घर बनाने की एक एक ईंट हो!!

     
  2. M VERMA

    21/10/2010 at 6:30 अपराह्न

    अप्रमाद ही घर का आंगन है।सुव्यवस्था ही घर की शोभा है।सुन्दर रेखांकन ..

     
  3. सुज्ञ

    21/10/2010 at 7:42 अपराह्न

    चेतन्य जी,आपने मेरे मनोबल रूपी घर में एक मजबूत ईंट का योगदान दिया।आभार

     
  4. सुज्ञ

    21/10/2010 at 7:44 अपराह्न

    वर्मा जी,आपकी सराहना मेरे लिये उत्तम संबल होती है।

     
  5. Arvind Mishra

    21/10/2010 at 8:11 अपराह्न

    वाह क्या कहने -घर सु – परिभाषित !

     
  6. ZEAL

    21/10/2010 at 8:22 अपराह्न

    .सुज्ञ जी,बहुत ही शानदार तरीके से आपने एक सुन्दर हँसते-खेलते घर को परिभाषित किया है।ऐसा ही होना चाहिए।आभार। .

     
  7. सुज्ञ

    21/10/2010 at 8:23 अपराह्न

    अरविंद मिश्र जी,आपने कहा, सुपरिभाषित! मेरा श्रम सफ़ल हुआ।

     
  8. सुज्ञ

    21/10/2010 at 8:26 अपराह्न

    दिव्या जी,आपके समर्थन से मेरा यह घर खिल उठा।

     
  9. Sunil Kumar

    21/10/2010 at 9:16 अपराह्न

    घर की नयी परिभाषा अच्छी लगी

     
  10. abhishek1502

    21/10/2010 at 9:58 अपराह्न

    मकान और घर में अंतर स्पष्ट कर दिया आप ने अति उत्तम

     
  11. Akhtar Khan Akela

    21/10/2010 at 10:04 अपराह्न

    hnsraaj bhayi bura mt manna aapne itna kuch likh diyaa he ke mere pas is mamle men tippni krne ke liyen shbd nhin bche hen bhut khub likhaa he mzaa aa gya baar baar ise pdhte rhne ko ji chahta he. akhtar khan akela kota rajsthan

     
  12. प्रतुल वशिष्ठ

    21/10/2010 at 10:12 अपराह्न

    .घर की नींव और छत जिनसे बनी है, घर में प्रवेश लेने वालों का ध्यान फिर से उस ओर ले जाओ. इस घर के बाहर एक पट्टिका लगाओ कि "प्रशंसा करने से पहले छत को निहारो, नींव को कमज़ोर मत होने दो". तभी यह घर दिव्य होगा और इस घर के समक्ष सरोवर में कमल खिलेंगे. .

     
  13. DR. ANWER JAMAL

    21/10/2010 at 10:31 अपराह्न

    ईश्वर इस सारे ब्रह्माण्ड का राजा है। इन्सानों को उसी ने पैदा किया और उन्हें राज्य भी दिया और शक्ति भी दी। सत्य और न्याय की चेतना उनके अंतःकरण में पैवस्त कर दी। किसी को उसने थोड़ी ज़मीन पर अधिकार दिया और किसी को ज़्यादा ज़मीन पर। एक परिवार भी एक पूरा राज्य होता है और सारा राज्य भी एक ही परिवार होता है। ‘रामनीति‘ यही है। जब तक राजनीति रामनीति के अधीन रहती है, राज्य रामराज्य बना रहता है और जब वह रामनीति से अपना दामन छुड़ा लेती है तो वह रावणनीति बन जाती है।

     
  14. दीर्घतमा

    21/10/2010 at 10:47 अपराह्न

    इस टिप्पणी को एक ब्लॉग व्यवस्थापक द्वारा हटा दिया गया है.

     
  15. दीर्घतमा

    21/10/2010 at 10:51 अपराह्न

    सुज्ञ जी क्षमा करियेगा टिप्पड़ी कही की कही लग गयी —-अपने माकन और घर में अंतर बताया है माकन को घर बनाना ही भारतीय परंपरा है धन्यवाद

     
  16. mahendra verma

    21/10/2010 at 10:59 अपराह्न

    मकान तो सब बना लेते हैं, घर बनाने वाले बिरले ही होते हैं…कविता में जीवन दर्शन निहित है।

     
  17. anshumala

    21/10/2010 at 11:34 अपराह्न

    सुज्ञ जी बिल्कूल सही कहा ये सारी चीजे जहा होती है वही मकान घर बनता है |

     
  18. अनामिका की सदायें ......

    22/10/2010 at 12:13 पूर्वाह्न

    सारी ईंटे इकट्ठी कर दी. बस नेक नियति के गारे की जरुरत है अब.

     
  19. Udan Tashtari

    22/10/2010 at 5:30 पूर्वाह्न

    रचना एक सीख भी दे जा रही है, बहुत बढ़िया.

     
  20. राजभाषा हिंदी

    22/10/2010 at 9:38 पूर्वाह्न

    वाह! यह घर — स्वर्ग सा घर होगा! सबका घर ऐसा हो!! भारतीय एकता के लक्ष्य का साधन हिंदी भाषा का प्रचार है!पक्षियों का प्रवास-१

     
  21. Shah Nawaz

    22/10/2010 at 10:02 पूर्वाह्न

    वाह बेहतरीन रचना… अपने सौ फीसदी सच कहा, एक-एक बात मोती की तरह है… बहुत खूब!

     
  22. अमित शर्मा

    22/10/2010 at 12:24 अपराह्न

    बहुत बढ़िया भाव है सुग्यजी घर में ही शांति मिलती है मकान(भवन) में नहीं दुनिया के किसी भी कोने में चले जाएँ, कहीं भी रह आयें इन्सान की पनाहगाह घर ही होती है. 'मकान' तभी 'घर' होता है जब उसमें रहने वाले उसे सही मायनों में घर बनाना चाहते हों. कोई भी घर ' तेरा-मेरा घर' होने पर घर नहीं बल्कि मकान बन जाता है. घर जब ' हमारा घर' बनता है तभी 'घर' सार्थक होता है.

     
  23. संगीता पुरी

    22/10/2010 at 12:46 अपराह्न

    बहुत सही !!

     
  24. वन्दना

    22/10/2010 at 1:32 अपराह्न

    वाह वाह ………………जहाँ इन सब का समावेश हो सच मे वो ही घर है……………बेहद उम्दा प्रस्तुति।

     
  25. पी.सी.गोदियाल

    22/10/2010 at 1:35 अपराह्न

    संतुष्ट नारी ही घर की लक्ष्मी है।जिम्मेदार पुरुष ही घर का छत्र है।इससे दो बातें तो साफ़ हो गई , एक यह कि पुरुष कम ही संतुष्ट होते है, और नारियां कम जिम्मेदार 🙂

     
  26. सुज्ञ

    22/10/2010 at 1:55 अपराह्न

    गोदियाल जी,मुद्दा मत उछालो, (नाकारात्मक वचन न कहो)वैसे भी यहां ब्लोग जगत में जीवन के दो आवश्यक अंगों को अलग अलग ग्रूप में बांटा जा रहा है।@एक यह कि पुरुष कम ही संतुष्ट होते है, और नारियां कम जिम्मेदार###नारी को संतुष्ट रखना पुरूष का कर्तव्य है, और पुरूष को जिम्मेदार बनाए रखना नारी का फ़र्ज़.क्षमायाचना सहित, आभार!!

     
  27. सतीश सक्सेना

    22/10/2010 at 8:22 अपराह्न

    काश ब्लाग जगत में भी एक छत मिल जाये !यह रचना घर में दीवाल पर टांगने लायक है मेरी हार्दिक शुभकामनायें हंसराज भाई

     
  28. संगीता स्वरुप ( गीत )

    22/10/2010 at 8:50 अपराह्न

    bahut sarthak …yadi yah sab ho to makaan ho ya na ho ghar zaroor ban jayega …

     
  29. सुज्ञ

    22/10/2010 at 8:54 अपराह्न

    दीदी,आपका ही इंतज़ार कर रहा था, आपने आकर घर के द्वार पर मंगल तोरण लगा दिया।आभार।

     
  30. एस.एम.मासूम

    23/10/2010 at 7:36 पूर्वाह्न

    सुज्ञ जी @ बहुत ही सुंदर अभिव्यक्ति , आज ऐसे घर ही तो नहीं मिलते, मकान बहुत से बन जाया करते हैं. हर एक पंक्ति पे तारीफ करने को दिल चाहता है. बहुत दिनों बाद कुछ ऐसा पढने को मिला जो दिल को भा गया.

     
  31. दिगम्बर नासवा

    25/10/2010 at 1:40 अपराह्न

    एक अच्छे घर के सारे लक्षण आपने बता दिए … लाजवाब कविता है …

     
  32. Kunwar Kusumesh

    28/05/2013 at 10:06 पूर्वाह्न

    बहुत बढ़िया.

     

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ज्ञानदत्त पाण्डेय का हिन्दी ब्लॉग। मैं यह ब्लॉग लिखने के अलावा गाँव विक्रमपुर, जिला भदोही, उत्तरप्रदेश, भारत में रह कर ग्रामीण जीवन जानने का प्रयास कर रहा हूँ। रेलवे से ज़ोनल रेलवे के विभागाध्यक्ष के पद से रिटायर्ड अफसर।

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