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मै न हिंदु, न इस्लाम, न जैन, न बौध प्रचारक हूं, मै हूं मात्र जीवदया वादी।

21 अगस्त

लोगो को लगता है कि मैँ शाकाहार के बहाने किसी धर्म का प्रचार कर रहा हूँ किंतु यह सच नही हैमेरे शाकाहार मांसाहार सम्बंधी आलेखो को किसी भी धर्म का अपमान न माना जाय।  यह किसी भी धर्म को हीन बताने के उद्देश्य से नहीं है। फिर भी किसी विचारधारा में दया जैसा कुछ भी नहीं है तो उस धर्म मेँ धर्म जैसा है भी क्या? यदि हिंसक कुरीति, धार्मिक आस्था का चोला पहन कर आती है तो ऐसी कुरीतियो पर आघात करना जागरूकता कहलाता है। मेरा मक़सद अहिंसा है, जीव दया है, इसलिए बात मात्र इतनी सी है कि कईं प्रकार की हिंसाओं से जब मानव बच सकता है,तो उसे क्यों न हिंसा से बचना चाहिए?

हिंसा पाप है और हर व्यक्ति को पाप को पाप स्वीकार करना ही चाहिए, फिर चाहे वह धर्म के नाम पर या धार्मिक आस्थाओँ की ओट में ही क्यो न किया जा रहा हो।  मैं तो यह स्वीकार करता हूं कि मेरे शाकाहार से भी, मेरे गमन-आगमन से, साथ ही जीवन के कई कार्यों से जीवहिंसा होती है. किंतु अपने लिए आवश्यक होने मात्र से कोई पाप कृत्य धर्म नही बन जाता, वह पाप ही माना जाएगा। बस ध्यान विवेक व सावधानी इसी बात पर हो कि हमसे बडी जीवहिंसा न हो जाय। यह कुटिलता नहीं कि अपरिहार्यता के कारण पाप को भी धर्म बताया जाय।
कहते है कि किसी की आस्थाओं और भावनाओं को ठेस नहीं पहुँचानी चाहिए। लेकिन जरा सी सार्थक ठेस से यदि आस्थाएँ कांप उठे तो वे कैसी आस्थाएँ? मै तो कहता हूँ बेशक उन अस्थिर आस्थाओं को ठेस पहुँचाओ यदि वे आस्थाएं कुरीति है। इन ठेसों से ही सम्यक् आस्थाओं को सुदृढ़ होने का औचित्य प्राप्त होता है। बस यह ध्यान रखना आवश्यक है कि ठेस कुतर्कों से किसी को मात्र बुरा साबित करने के लिए ही न पहुँचाई जाय।

 

13 responses to “मै न हिंदु, न इस्लाम, न जैन, न बौध प्रचारक हूं, मै हूं मात्र जीवदया वादी।

  1. कविता रावत

    21/08/2010 at 3:25 अपराह्न

    कहते है कि किसी की आस्थाओं और भावनाओं को ठेस नहिं पहूंचानी चाहिए, मै तो कह्ता हूं बेशक ठेस पहूंचाओ अगर आस्थाएं कुरिति है। इन ठेसों से ही उन आस्थाओं को सम्हलने का अवसर मिलता है। बस ठेस किसी को बुरा साबित करने की भावना से न पहूंचाई जाय। …bilkul sach kaha aapne ashthyon mein aadambar aur andhvishwas ho to uska andhanukarn nahi karne kee seekh di jani chahiye…

     
  2. Mahak

    21/08/2010 at 6:50 अपराह्न

    आपकी हर बात से पूरी तरह सहमत हूँ , very nice post

     
  3. सुज्ञ

    21/08/2010 at 8:28 अपराह्न

    कविता जी,प्रोत्साहन के लिये धन्यवाद

     
  4. सुज्ञ

    21/08/2010 at 8:29 अपराह्न

    महक जी,आभार आपका।

     
  5. पं.डी.के.शर्मा"वत्स"

    21/08/2010 at 9:37 अपराह्न

    आप बेशक स्पष्टीकरण देते रहें, लेकिन निर्बुद्धि कूपमंडूक तो वही समझेंगें, जो वे असल में समझना चाहते हैं🙂

     
  6. Mahak

    21/08/2010 at 9:53 अपराह्न

    हर व्यक्ति को पाप को पाप स्वीकार करना चाहिए न कि पाप में भी धर्म बताया जाय।

     
  7. प्रवीण शाह

    22/08/2010 at 9:31 पूर्वाह्न

    …प्रिय हंसराज 'सुज्ञ' जी,मैं वैसे तो इस बहस में नहीं पड़ना चाहता था परंतु यदि आप गलत आस्थाओं पर ठेस पहुंचाने की ही बात कर रहे हैं तो लीजिये ठेस क्या हथौड़े से प्रहार कर रहा हूँ आपकी इस आस्था पर कि " शाकाहार ही मनुष्य के लिये सही आहार है"*** Family of Apes में शिखर पर है मानव, सभी कपि थोड़ी बहुत मात्रा में मांसाहार का सेवन करते हैं।*** प्रागैतिहासिक युग,पाषाण युग, कांस्य युग और लौह युग में मानव जाति मुख्य रूप से मांसाहारी ही थी व मांसाहार कर ही जीवित रही थी।*** प्रकृति ने मानव को Binocular Vision दिया है जो मांसाहारी पशुओं में ही अधिकतर देखा जाता है, शिकार में सहायक है।*** मानव के पास Incisors व Canines नाम के दांत हैं जो केवल मांसाहारियों में ही पाये जाते हैं।*** मनुष्य की आंत्र की लम्बाई न तो मांसाहारी पशुओं जितनी कम है और न ही शाकाहारी पशुओं के जैसी लम्बी अपितु बीच की है तकरीबन २७-२८ फुट।*** शाकाहारी पशु कुदरती तौर पर बहते जल को चूस कर पीते हैं जबकि मांसाहारी पशु चाट कर, मनुष्य दोनों तरीके से पी सकता है।*** शाकाहारियों के लिये जरूरी Appendix मनुष्य के शरीर के लिये Vestigeal Organ है।*** बहुत से ऐसे विटामिन, इसेंशियल अमीनो एसिड व अन्य पोषक तत्व हैं जिनकी पूर्ति मानव शरीर में मात्र शाकाहार से नहीं हो सकती है।*** Peak Performance मांसाहार के बिना कभी नहीं पाई जा सकती है कोई भी Sports Dietician आपको इस तथ्य की पुष्टि कर देगा।अंतिम निचोड़ यही है कि आज के मानव के आहार में शाकाहार व मांसाहार का संतुलन होना चाहिये।आभार!…

     
  8. Mithilesh dubey

    22/08/2010 at 12:41 अपराह्न

    कहते है कि किसी की आस्थाओं और भावनाओं को ठेस नहिं पहूंचानी चाहिए, मै तो कह्ता हूं बेशक ठेस पहूंचाओ अगर आस्थाएं कुरिति है। इन ठेसों से ही उन आस्थाओं को सम्हलने का अवसर मिलता है। बस ठेस किसी को बुरा साबित करने की भावना से न पहूंचाई जाय।सहमत हूँ ।

     
  9. JHAROKHA

    23/08/2010 at 11:07 पूर्वाह्न

    sugy ji, bahut hi sahi yatharthparak lekh.main aapse puri tarah sahmat hun.agar kisi galat bhavana se kisi ko bhi thes pahnuchai jaaye to ye uchit nahi.bahut hibadhiya prastuti. poonam

     
  10. सुज्ञ

    23/08/2010 at 11:18 पूर्वाह्न

    पडित जी,आभार आपका, साफ़ मन से प्रयास तो जारी रखें,यही भाव है।

     
  11. सुज्ञ

    23/08/2010 at 11:25 पूर्वाह्न

    प्रवीण शाह जी,आपका मेरे ब्लोग पर पधारना ही, मेरे लिये अविस्मर्णिय अनुभव है,कभी हमारे ब्लोग तो कभी आपके चित्र को देखते है।आपके ज्ञानवर्धक आलेखों को नियमित पढता हूं, सामर्थय बने तो टिप्प्णी भी कर आता हूंआपका आना ही अच्छा लगा। यह प्रहार भी बडा मनभावन ही है, मैने तो कहा भी है कि "इन ठेसों से ही उन आस्थाओं को सम्हलने का अवसर मिलता है।"पर आपकी यह चोटें कुछ पुरानी सी है,उस जमाने की जब शाकाहारी लोग मात्र दांत और आंत का तर्क दिया करते थे,और मांसाहारी यह आप वाले तर्क छ्पवाते थे। यह सब मेरे लिये एक बडी पोस्ट का आधार बनेंगे। अतः शुक्रिया।आपका अंतिम निचोड ही मेरे काम का है,मानते तो हम भी यही है कि मानव दोनों का प्रयोग करोडों वर्षों से करता आ रहा है। बस आगे के आहार संतुलन को न्युनत्तम हिंसा तक ले जाना ही प्रयोजन है।

     
  12. सुज्ञ

    23/08/2010 at 11:27 पूर्वाह्न

    मिथिलेश जी,धन्यवाद, आपका पधारना भी हुआ, प्रोत्साहन के लिये आभार

     
  13. सुज्ञ

    23/08/2010 at 11:32 पूर्वाह्न

    पूनम बहना,किसी सही को बूरी नियत से बुरा साबित करना ही ठेस माना जाना चाहिए।धन्यवाद, बहना

     

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ज्ञानदत्त पाण्डेय का हिन्दी ब्लॉग। मैं यह ब्लॉग लिखने के अलावा गाँव विक्रमपुर, जिला भदोही, उत्तरप्रदेश, भारत में रह कर ग्रामीण जीवन जानने का प्रयास कर रहा हूँ। रेलवे से ज़ोनल रेलवे के विभागाध्यक्ष के पद से रिटायर्ड अफसर।

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