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कुरीति अगर धार्मिक आस्था का चोला पहन कर आयेगी तो……।

21 अगस्त

मेरे शाकाहार मांसाहार आलेखो को किसी भी धर्म का अपमान न माना जाय। इस आधार पर मेरा किसी भी धर्म को हीन बताने का उद्देश्य नहिं है। पर कुरिति अगर धार्मिक आस्था का चोला पहन कर आयेगी तो मैं आघात अवश्य करूंगा। मेरा मक़्सद अहिंसा है, जीव दया है, बस मेरी बात इतनी सी है कि कंई प्रकार की हिंसाओं से बचा जा सकता है तो क्यों न बचें।

हर व्यक्ति को पाप को पाप स्वीकार करना चाहिए, जैसे कि मैं स्वीकार करता हूं मेरे शाकाहार से, मेरे गमन-आगमन से और जीवन के कई कार्यों से जीवहिंसा होती है,और यह पाप भी है। बस ध्यान मेरा यही रहता है कि अनावश्यक,और बडी जीवहिंसा न हो।
न कि पाप में भी धर्म बताया जाय। पाप को धर्म बताकर हम अपनी अनुकूलताएँ साधें।


कहते है कि किसी की आस्थाओं और भावनाओं को ठेस नहिं पहूंचानी चाहिए, मै तो कह्ता हूं बेशक ठेस पहूंचाओ अगर आस्थाएं कुरिति है। इन ठेसों से ही उन आस्थाओं को सम्हलने का अवसर मिलता है। बस ठेस किसी अच्छी बात को बुरा साबित करने की भावना से न पहूंचाई जाय।

 

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12 responses to “कुरीति अगर धार्मिक आस्था का चोला पहन कर आयेगी तो……।

  1. DR. ANWER JAMAL

    21/08/2010 at 4:30 अपराह्न

    वास्तविकता तो यह है कि स्रष्टा प्राकृतिक संतुलन के लिए एक जीव को दुसरे जीव पर निर्भर बनाया है । मांसभक्षण प्रकृति का एक अनिवार्य क्रिया है । भोजन को मांसाहार और शाकाहार दो हिस्सों में बाँटना एक धोखा है , अन्धविश्वास है । आज विज्ञानं के युग में जबकि हमें प्रत्येक जीव और वनस्पति की हिस्ट्री और कैमिस्ट्री मालूम है फिर भी आज हमारे तथाकथित गुरु अपने अपने धर्मशास्त्रों, वैज्ञानिक सत्यों और प्राकृतिक व्यवस्था का विरोध न जाने क्यों कर रहे हैं? आज हम सम्पूर्ण वनस्पति जगत, प्राणी जगत, और विशाल समुंदरी जगत की वास्तविकता घर बैठे देख रहे हैं इसलिए यह बात आसानी से समझ सकते हैं कि अगर विश्व में मांसाहार पर 100 प्रतिशत प्रतिबन्ध लगा दिया जाए तो क्या हम 700 करोड़ लोगों कि आहार पूर्ती केवल अनाज से कर पाएंगे? हमारी सम्पूर्ण पृथ्वी का 30 प्रतिशत थल और लगभग 70 प्रतिशत समुन्द्र है । 30 प्रतिशत थल में भी पहाड़ हैं , रेगिस्तान है, वन खंड है, बंजर है, नदी-नाले है आवास है , जो कृषि योग्य भूमि है वह अत्यंत कम है । इस कृषि योग्य भूमि से मानव जाती कि आहार पूर्ति संभव नहीं है।फिर आखिर यह बात हमारी समझ में क्यों नही आती कि मांस भक्षण मानव जाति कि आहार पूर्ति कि लिए अपरिहार्य है । इसका हमारे पास अन्य कोई विकल्प नहीं । अगर मांस भक्षण पर प्रतिबन्ध लगा दिया जाए तो अंदाज़ा लगाइए कि एक रोटी कि कीमत क्या होगी? मांस एक प्राकृतिक आहार है । मांस भक्षण का विरोध करना प्राकृतिक व्यवस्था के खिलाफ है । शाकाहारवाद एक अप्राकृतिक धारणा है, इसे कभी पूर्णतया लागू ही नहीं किया जा सकता । आने वाले समय में तो कुछ ऐसे लगता है कि मनुष्य कि आहार पूर्ति केवल समुन्द्र ( Sea Food ) से होगी और सच भी यही है कि अति विशाल समुन्द्र ही हमारी आहार पूर्ति का मूल स्रोत है । जो शाकाहारवादी ( Extremist Vegetarianism ) मंशार का पुरजोर विरोध कर रही हैं, उन्हें अपनी रूढ़वादी और मिथ्या धारणा पर पुनर्विचार करना चाहिए । प्राकृतिक सत्यों को झुठलाना स्वयं को अज्ञानी और अन्धविश्वासी साबित करना है ।यहाँ मेरा उद्देश्य मांसाहार को प्रोत्साहित करना हरगिज़ नहीं है , जो खाना है खाये । यह समाज , राष्ट्र और विश्व कि कोई ज्वलंत समस्या नहीं है । यहाँ मेरा उद्देश्य मात्र इतना है कि हम सब कोई ऐसे भ्रामक प्रचार न करें जिसका हमारे समाज पर निकट भविष्य में बुरा और प्रतिकूल प्रभाव पड़े ।

     
  2. सुज्ञ

    21/08/2010 at 6:12 अपराह्न

    DR. ANWER JAMAL साहब,यह बात तो सही है कि, सृष्टा कहो या प्रकृति, उसने प्राकृतिक संतुलन के लिए एक जीव को दुसरे जीव पर निर्भर बनाया है । लेकिन मांसभक्षण सभी जीवों के लिये प्रकृति का एक अनिवार्य अंग नहिं है । भोजन सदैव मांसाहार और शाकाहार दो हिस्सों में बंटा हुआ ही है , यह अन्धविश्वास थोडे ही है जब हम ऐसे प्राणी देखते है जो मात्र शाकाहार ही करते है। यदि विपरित परिस्थिति हो तब भी वे मांसाहारी नहिं बनते। विज्ञानं से भी साबित है कि कुछ जीव मांसाहार से तो कुछ जीव शाकाहार से सीधी जीवनउर्जा प्राप्त करते है। क्या मानव सबसे बुद्धिमान प्राणी है इस लिये वह मनमर्जी दोनो ही तरह प्रकृति का दोहन करे। आने वाला दुष्कर समय जब आयेगा तब आयेगा, वर्तमान में तो सृष्टा या प्रकृति, दोनो हाथों लूटा रही है सम्पदा।और इसलिये कि जगत शांत बना रहे।प्रकृति हमारी कोशीशो से कहीं बेह्त्तर प्राकृतिक संतुलन स्थापित कर रही है।

     
  3. राजभाषा हिंदी

    22/08/2010 at 8:46 पूर्वाह्न

    विचारोत्तेजक।*** राष्ट्र की एकता को यदि बनाकर रखा जा सकता है तो उसका माध्यम हिन्दी ही हो सकती है।

     
  4. Dr. Ayaz Ahmad

    22/08/2010 at 9:35 पूर्वाह्न

    SUGHजी कुछ पौधे तो स्वयं जीव भक्षण करते है आपका प्रकृति की इस व्यवस्था के बारे मे क्या विचार है

     
  5. प्रवीण शाह

    22/08/2010 at 1:19 अपराह्न

    …प्रिय हंसराज 'सुज्ञ' जी,मैं वैसे तो इस बहस में नहीं पड़ना चाहता था परंतु यदि आप गलत आस्थाओं पर ठेस पहुंचाने की ही बात कर रहे हैं तो लीजिये ठेस क्या हथौड़े से प्रहार कर रहा हूँ आपकी इस आस्था पर कि " शाकाहार ही मनुष्य के लिये सही आहार है"*** Family of Apes में शिखर पर है मानव, सभी कपि थोड़ी बहुत मात्रा में मांसाहार का सेवन करते हैं।*** प्रागैतिहासिक युग,पाषाण युग, कांस्य युग और लौह युग में मानव जाति मुख्य रूप से मांसाहारी ही थी व मांसाहार कर ही जीवित रही थी।*** प्रकृति ने मानव को Binocular Vision दिया है जो मांसाहारी पशुओं में ही अधिकतर देखा जाता है, शिकार में सहायक है।*** मानव के पास Incisors व Canines नाम के दांत हैं जो केवल मांसाहारियों में ही पाये जाते हैं।*** मनुष्य की आंत्र की लम्बाई न तो मांसाहारी पशुओं जितनी कम है और न ही शाकाहारी पशुओं के जैसी लम्बी अपितु बीच की है तकरीबन २७-२८ फुट।*** शाकाहारी पशु कुदरती तौर पर बहते जल को चूस कर पीते हैं जबकि मांसाहारी पशु चाट कर, मनुष्य दोनों तरीके से पी सकता है।*** शाकाहारियों के लिये जरूरी Appendix मनुष्य के शरीर के लिये Vestigeal Organ है।*** बहुत से ऐसे विटामिन, इसेंशियल अमीनो एसिड व अन्य पोषक तत्व हैं जिनकी पूर्ति मानव शरीर में मात्र शाकाहार से नहीं हो सकती है।*** Peak Performance मांसाहार के बिना कभी नहीं पाई जा सकती है कोई भी Sports Dietician आपको इस तथ्य की पुष्टि कर देगा।अंतिम निचोड़ यही है कि आज के मानव के आहार में शाकाहार व मांसाहार का संतुलन होना चाहिये।आभार!…

     
  6. सुज्ञ

    23/08/2010 at 10:18 पूर्वाह्न

    अयाज़ साहब,प्रकृति में जो है वह सच है,कौन इससे इन्कार करने में समर्थ है।हां कुछ पेड-पौधे भी कीटों के शरीर का रस चूस लेते है।आप तो ऐसे पुछ रहे है जैसे वनस्पति,वनस्पति न हुई किसी शुद्ध आचरण साधु के समान माना जा रहा है।

     
  7. सुज्ञ

    23/08/2010 at 10:25 पूर्वाह्न

    प्रवीण शाह जी,आपका मेरे ब्लोग पर पधारना ही, मेरे लिये अविस्मर्णिय अनुभव है,कभी हमारे ब्लोग तो कभी आपके चित्र को देखते है।आपके ज्ञानवर्धक आलेखों को नियमित पढता हूं, सामर्थय बने तो टिप्प्णी भी कर आता हूंआपका आना ही अच्छा लगा।

     
  8. सुज्ञ

    23/08/2010 at 10:40 पूर्वाह्न

    प्रवीण शाह जी,यह प्रहार भी बडा मनभावन ही है, मैने तो कहा भी है कि "इन ठेसों से ही उन आस्थाओं को सम्हलने का अवसर मिलता है।"पर यह चोटें कुछ पुरानी सी है,उस जमाने की जब शाकाहारी लोग मात्र दांत और आंत का तर्क दिया करते थे,और मांसाहारी यह तर्क छ्पवाते थे। यह सब मेरे लिये एक बडी पोस्ट का आधार बनेंगे। अतः शुक्रिया।आपका अंतिम निचोड ही मेरे काम का है,मानते तो हम भी यही है कि मानव दोनों का प्रयोग करोडों वर्षों करता आ रहा है। बस आगे के संतुलन को न्युनत्तम हिंसा तक ले जाना है।

     
  9. सतीश सक्सेना

    27/08/2010 at 11:35 पूर्वाह्न

    बहुत बढ़िया लेख और प्रवीण शाह जी के आने से उसमें जान पड़ गयी ! मैं तो बात जीव पर दया की करता हूँ मानव अगर किसी दूसरे जीव को मार कर खा रहा है शायद यह भूल जाता होगा पौराणिक काल अथवा प्रस्तर युग में यही मानव के साथ होता था ! तब हम मानव भक्षियों को राक्षस कहते थे ! कल्पना करें किसी राक्षस का मानव को कच्चा खाने का वीभत्स रूप और फिर खाइए एक मासूम बकरी के बच्चे को ….मैं भी कभी कभी मुर्गा खाता हूँ मगर खाते समय यह अवश्य बताता हूँ कि प्रागैतिहासिक काल में हमें भी कोई ऐसे खाता होगा !देखते हैं डॉ अयाज अहमद और प्रवीण भाई इस पर क्या कहते हैं ??

     
  10. सुज्ञ

    27/08/2010 at 12:09 अपराह्न

    सतीश जी,प्रवीण भाई ने भी जब भ्रमित तर्क दिया जैसे कि:"शाकाहारी पशु कुदरती तौर पर बहते जल को चूस कर पीते हैं जबकि मांसाहारी पशु चाट कर, मनुष्य दोनों तरीके से पी सकता है।"जबकि विदित है मनुष्य जीब से चाट कर पानी नहिं पी सकता।

     
  11. राजेश उत्‍साही

    28/08/2010 at 12:52 अपराह्न

    असल में यह बहस बेमानी है। अगर इसे करना ही है तो विज्ञान के तथ्‍यों को ध्‍यान में रखा जाना होगा। अहिंसा की बात करना केवल मांसाहार या शाकाहार नहीं है।

     

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ज्ञानदत्त पाण्डेय का हिन्दी ब्लॉग। मैं यह ब्लॉग लिखने के अलावा गाँव विक्रमपुर, जिला भदोही, उत्तरप्रदेश, भारत में रह कर ग्रामीण जीवन जानने का प्रयास कर रहा हूँ। रेलवे से ज़ोनल रेलवे के विभागाध्यक्ष के पद से रिटायर्ड अफसर।

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