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ईश्वर नें जानवरों को हमारे भोजन के लिये ही पैदा किया है? (हिंसा अनुमति का यथार्थ)

20 अगस्त

वैसे तो शाकाहार – मांसाहार का सम्बंध किसी धर्म विशेष से नहीं है,लेकिन मांसाहार प्रचार में सलग्न लोग इस कहावत को सार्थक करते लगते है कि ‘मांस खाए तो मुसलमान’। क्योंकि मांसाहार आदतों को बचाने के लिए इस्लाम के अनुयायी ही जी-जान से जुटे नज़र आते है। और अपने शास्त्रो से ‘अनुमति’ को ‘आदेश’ की तरह आगे करते है। जबकि यह भी निश्चित नहीं कि वह ‘अनुमति’ है या ‘उल्लेख’ मात्र। प्रस्तुत आलेख मांसाहार को उसी दृष्टिकोण से परखने का प्रयास है।

 ईश्वर नें जानवरों को हमारे भोजन आदि के लिये ही पैदा किया है?

अक्सर कुरआन की चार आयतों का हवाला देकर, यह ‘अनुमति’ की बात कही जाती हैं, आइए देखते है उन आयतों के क्या मायने है।

“ऐ लोगों, खाओ जो पृथ्वी पर है लेकिन पवित्र और जायज़ (कुरआन 2:168)

“ऐ ईमान वालों, प्रत्येक कर्तव्य का निर्वाह करो| तुम्हारे लिए चौपाये जानवर जायज़ है, केवल उनको छोड़कर जिनका उल्लेख किया गया है” (कुरआन 5:1)

इन आयतों में ‘मांस’ शब्द नहीं है। कहा मात्र यह गया है, खाओ जो पृथ्वी पर है लेकिन पवित्र और जायज़ । ‘पवित्र और जायज़’ में जायज़ तो शाकाहार भी है। और क्या करें जब पृथ्वी के धूल पत्थर को नाज़ायज़ नहीं कहा गया? यहां आशय मात्र यह है कि जानवरो का सवारी, ऊन आदि के लिये उपयोग जायज़ है।

“रहे पशु, उन्हें भी उसी ने पैदा किया जिसमें तुम्हारे लिए गर्मी का सामान (वस्त्र) भी और अन्य कितने लाभ. उनमें से कुछ को तुम खाते भी हो” (कुरआन 16:5)

“और मवेशियों में भी तुम्हारे लिए ज्ञानवर्धक उदहारण हैं. उनके शरीर के अन्दर हम तुम्हारे पीने के लिए दूध पैदा करते हैं और इसके अलावा उनमें तुम्हारे लिए अनेक लाभ हैं, और जिनका माँस तुम प्रयोग करते हो” (कुरआन 23:21)

इन आयतों में ‘खाना’ व ‘माँस’ शब्द अवश्य है। लेकिन इसे बडी सावधानी से मनन करने की आवश्यकता हैं। यहां अल्लाह, जानवरों को गर्मी के सामान के लिये पैदा करनें की तो जिम्मेदारी लेता है, पर खाने की क्रिया बात और कर्म बंदे पर छोडता है। अर्थ साफ़ है ‘कुछ को तुम खाते हो’। यह वाक्य खाने की आदतों का उल्लेख मात्र है। यहां कोई आज्ञा या आदेश नहीं है। उस समय के परिवेश और काल अनुसार कि तुम लोग खाते थे, आपकी आदतों का बयान मात्र है। कोई अनुमति नहीं। और यदि अनुमति का ही आसरा लिया जाय तब भी अनावश्यक रूप से अनुमति का उपभोग करना जरूरी नहीं है।

निशानी:

और तुम्हारे लिए चौपायों में से एक बड़ी शिक्षा-सामग्री है, जो कुछ उनके पेटों में है उसमें से गोबर और रक्त से मध्य से हम तुम्हे विशुद्ध दूध पिलाते है, जो पीनेवालों के लिए अत्यन्त प्रिय है, (16 : 66) और खजूरों और अंगूरों के फलों से भी, जिससे तुम मादक चीज़ भी तैयार कर लेते हो और अच्छी रोज़ी भी। निश्चय ही इसमें बुद्धि से काम लेनेवाले लोगों के लिए एक बड़ी निशानी है (16 : 67)

और निश्चय ही तुम्हारे लिए चौपायों में भी एक शिक्षा है। उनके पेटों में जो कुछ है उसमें से हम तुम्हें पिलाते है। औऱ तुम्हारे लिए उनमें बहुत-से फ़ायदे है और उन्हें तुम खाते भी हो (23 : 21)

उपरोक्त अलग अलग आयतों में अल्लाह ने अपने प्रदान का उल्लेख करते हुए, अपने दिए हुए से तुम लगाकर, कहे गए और तुम्हारे द्वारा किए जाने में भेद कर दिया है। अल्लाह ईशारा करते है कि जो कर्म तुम कर रहे हो इसमें बड़ी शिक्षा या बड़ी निशानी है, जिसे बुद्धि से काम लेने वालों को समझना चाहिए। यदि आयत 16:67 से ‘तुम’ लगाकर भी शराब का निषेध है तो 23:21 में भी ‘तुम’ लगे होने से अल्लाह की मांसाहार अनुमति नहीं हुई। मात्र जिक्र हुआ।

कुरआन में कईं जगह, रहम के परिपेक्ष्य में यह आदेश उल्लेखित होता है कि तुम ‘अनावश्यक हत्या’ न करो। भोजन के लिए पर्याप्त शाकाहार उपल्ब्ध होते हुए भी स्वादेन्द्रीय के वशीभूत, मांसाहार के प्रयोजन से जीव हिंसा करना ‘अनावश्यक हत्या’ ही है।

 

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33 responses to “ईश्वर नें जानवरों को हमारे भोजन के लिये ही पैदा किया है? (हिंसा अनुमति का यथार्थ)

  1. आलोक मोहन

    20/08/2010 at 4:45 अपराह्न

    जिस आदमी का धर्म,सस्कार्,परिवार उसे मास खाने की इजाजत देते हो वो आखिर किसे आप के एक आलेख से मासाहार छोड सकता है "mujhe nhi lagta ki kuran kisi ne padi hogi warna muhaand jaisa mahan insan kaise maas khane ki ijjat de sakta hai

     
  2. सुज्ञ

    20/08/2010 at 5:17 अपराह्न

    आलोक जी,मेरा काम मांसाहार छुडवाना नहिं,वो तो जिनके बस में होगा कर लेंगे। मेरा मक़सद है, इन आलेखों से अनावश्यक जीव हिंसा कम भी हो गई तो सफ़ल समझुंगा।

     
  3. सुज्ञ

    20/08/2010 at 8:48 अपराह्न

    सलीम खान साहब कह्ते हैं,1 – दुनिया में कोई भी मुख्य धर्म ऐसा नहीं हैं जिसमें सामान्य रूप से मांसाहार पर पाबन्दी लगाई हो या हराम (prohibited) करार दिया हो.

     
  4. सुज्ञ

    20/08/2010 at 8:49 अपराह्न

    सलीम खान साहब कह्ते हैं,2 – क्या आप भोजन मुहैया करा सकते थे वहाँ जहाँ एस्किमोज़ रहते हैं (आर्कटिक में) और आजकल अगर आप ऐसा करेंगे भी तो क्या यह खर्चीला नहीं होगा?

     
  5. सुज्ञ

    20/08/2010 at 8:50 अपराह्न

    सलीम खान साहब कह्ते हैं,3 – अगर सभी जीव/जीवन पवित्र है पाक है तो पौधों को क्यूँ मारा जाता है जबकि उनमें भी जीवन होता है.4 – अगर सभी जीव/जीवन पवित्र है पाक है तो पौधों को क्यूँ मारा जाता है जबकि उनको भी दर्द होता है.5 – अगर मैं यह मान भी लूं कि उनमें जानवरों के मुक़ाबले कुछ इन्द्रियां कम होती है या दो इन्द्रियां कम होती हैं इसलिए उनको मारना और खाना जानवरों के मुक़ाबले छोटा अपराध है| मेरे हिसाब से यह तर्कहीन है.

     
  6. सुज्ञ

    20/08/2010 at 8:51 अपराह्न

    सलीम खान साहब कह्ते हैं,6 -इन्सान के पास उस प्रकार के दंत हैं जो शाक के साथ साथ माँस भी खा/चबा सकता है.7 – और ऐसा पाचन तंत्र जो शाक के साथ साथ माँस भी पचा सके. मैं इस को वैज्ञानिक रूप से सिद्ध भी कर सकता हूँ | मैं इसे सिद्ध कर सकता हूँ.

     
  7. सुज्ञ

    20/08/2010 at 8:52 अपराह्न

    सलीम खान साहब कह्ते हैं,8 – आदि मानव मांसाहारी थे इसलिए आप यह नहीं कह सकते कि यह प्रतिबंधित है मनुष्य के लिए | मनुष्य में तो आदि मानव भी आते है ना.

     
  8. सुज्ञ

    20/08/2010 at 8:53 अपराह्न

    सलीम खान साहब कह्ते हैं,9 – जो आप खाते हैं उससे आपके स्वभाव पर असर पड़ता है – यह कहना 'मांसाहार आपको आक्रामक बनता है' का कोई भी वैज्ञानिक आधार नहीं है.

     
  9. सुज्ञ

    20/08/2010 at 8:55 अपराह्न

    कल इन पश्नों के युक्ति युक्त जवाब होगें,तब तक इस भूमिका पर आपकी राय जाननी है।टिप्पणी अवश्य करें

     
  10. सम्वेदना के स्वर

    20/08/2010 at 9:00 अपराह्न

    गहन परिचर्चा का विषय… वैसे जानवर, जानवर का भोजन तो है, इसीलिए किसी एक जानवर के विलुप्त हो जाने से पूरा संतुलन बिगड़ जाता है!

     
  11. Mahak

    20/08/2010 at 10:04 अपराह्न

    इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

     
  12. Mahak

    20/08/2010 at 10:07 अपराह्न

    @आदरणीय सुज्ञ जी आपका बहुत-२ आभार है इस इंसानियत के नाम पर कलंक को मिटाने के प्रयास को अपना समय ,बल ,सामर्थ्य , गति और सशक्तता , और जागरूकता प्रदान करने के लिए धर्म ग्रंथों का reference देकर कुप्रथाओं को जायज़ या नाजायज़ ठहराने सम्बन्धी मेरा व्यक्तिगत मत ये है की जो भी पहले हुआ है या लिखा गया है उसे शत-पर्तिशत सही या गलत मानकर अपना वर्तमान और भविष्य नहीं खराब किया जा सकता , हर धार्मिक ग्रन्थ से जो भी अच्छी या बुरी बात बात मिले उसे पहले तर्क की कसौटी पर परखें फिर उसका ग्रहण या त्याग करेंप्रकृति ने खुद ही ऐसी व्यवस्था कि हुई है शेर ,बाघ,लकडबघा,गिद्ध, मगरमच्छ आदि जीवों को उत्पन करके जिससे की प्रकर्ति का संतुलन बना रहे लें आज मानवों के इन दुष्कृत्यों के कारण वो संतुलन गड़बड़ा रहा है , हम इंसान हैं , हममें और मुर्दाखोर जानवरों में कुछ तो फर्क रहना चाहिए

     
  13. Shah Nawaz

    20/08/2010 at 11:15 अपराह्न

    आपने उचित ही कहा है, अनावश्यक रूप से मांस खाने से अवश्य ही बचा जा सकता है. जहाँ तक बात इस्लाम धर्म की है, तो इसमें मांस खाने की आज्ञा है हुक्म नहीं है. करोडो मुसलमान हैं जो शाकाहारी हैं. किसी भी धर्म का मांसाहारी होने से कोई ताल्लुक नहीं है. अल्लाह (ईश्वर) के रसूल (सन्देश वाहक) मुहम्मद (स.) ने फ़रमाया (अर्थ की व्याख्या) "अगर कोई किसी जीव को जीवन नहीं दे सकता है तो उसे उसके जीवन को भी नाहक समाप्त करने का हक नहीं है". यह बहुत ही गहरी बात है, इससे यह बात भी पता चलता है कि शौक के लिए शिकार करना नाजायज़ है.लेकिन इसमें एक बात और भी है. अगर मांस खाने की आज्ञा है तो किसी को हक नहीं है कि उसको बैन करदे अर्थात हलाल (जायज़) चीज़ को हराम (नाजायज़) करार नहीं दिया जा सकता है. यह तो व्यक्ति के विवेक पर निर्भर करना चाहिए कि उसे क्या पसंद है. जहाँ तक बात कुर्बानी की है तो इसका मकसद अल्लाह (ईश्वर) को प्रसन्न करना बिलकुल भी नहीं है. बल्कि इसका मकसद मांस खाने वाले गरीब लोगों को भोजन का वितरण है. कुर्बानी के मांस में से अधिक से अधिक एक तिहाई ही अपने घर में रखा जाता है और बाकी गरीब लोगो में भोजन के रूप में वितरित किया जाता है. इसमें जो लोग शाकाहारी होते हैं वह सारा का सारा गरीब लोगो में वितरित कर देते हैं.

     
  14. bharat bhaarti

    20/08/2010 at 11:44 अपराह्न

    श्री शाह नवाज़ से पूर्ण सहमत

     
  15. Mahak

    21/08/2010 at 12:16 पूर्वाह्न

    1 – दुनिया में कोई भी मुख्य धर्म ऐसा नहीं हैं जिसमें सामान्य रूप से मांसाहार पर पाबन्दी लगाई हो या हराम (prohibited) करार दिया हो.अच्छा तो इसका मतलब ये है की अब हमें कोई भी काम करने से पहले ये देखना पडेगा की ये धर्म उसके विषय में क्या कहता है और वो धर्म इसके विषय में क्या कहता है , भाई मेरे जब हर बात में ऐसा ही करना है तो उस सर्वशक्तिमान ईश्वर ने तुम्हे ये अक्ल क्या घास चरने के लिए दी है ? , हर चीज़ को तर्क की कसौटी पर परखा जाना अत्यंत आवश्यक ना की किसी धर्मविशेष की पुस्तक पर अपने आँख और अक्ल के दरवाजे बंद करकर विश्वास कर लेना , ऐसा विश्वास फिर विश्वास नहीं अंधविश्वास कहलाता है , इन धार्मिक पुस्तकों या ग्रंथों आदि में लिखने वाले को उस समय जो ठीक लगा उसने लिखा लेकिन इसका ये मतलब नहीं की हम इन्हें ही सही मान कर अपनी अक्ल को ताला लगा लें , हमें उनमें से जो भी बातें सही लगें उन्हें ग्रहण करें और जो भी गलत उसका त्याग , लेकिन धर्मान्ध होकर उन्हें ही universal truth मान लेना स्वयं ईश्वर द्वारा प्रदान की गई इस बुद्धि का अपमान और बेवकूफी के सिवा और कुछ नहीं है

     
  16. Mahak

    21/08/2010 at 12:17 पूर्वाह्न

    2 – क्या आप भोजन मुहैया करा सकते थे वहाँ जहाँ एस्किमोज़ रहते हैं (आर्कटिक में) और आजकल अगर आप ऐसा करेंगे भी तो क्या यह खर्चीला नहीं होगा?हम अपने परिवार के लोगों की सहायता या उनकी जीवन रक्षा करते हुए खर्चा देखते हैं या उनकी ज़रूरत , जिस देश में हज़ारों करोड़ों रूपये क्रिकेट मैच और सिनेमा आदि पर खर्च होते हों तो वहाँ पर किसी जीव के जीवन की रक्षा में खर्च होने वाले रूपये को खर्चा नहीं बल्कि उनका सदुपयोग कहा जाएगा

     
  17. Mahak

    21/08/2010 at 12:19 पूर्वाह्न

    3 – अगर सभी जीव/जीवन पवित्र है पाक है तो पौधों को क्यूँ मारा जाता है जबकि उनमें भी जीवन होता है.4 – अगर सभी जीव/जीवन पवित्र है पाक है तो पौधों को क्यूँ मारा जाता है जबकि उनको भी दर्द होता है.किसी जीव का मांस खाने का मतलब है उसकी हत्या कर देना क्योंकि बिना जीव की हत्या करे, उसे पीड़ा पहुंचाए उसका मांस खाना असंभव है लेकिन शाकाहार में ऐसा नहीं है ,हम जिस पेड़ से शाकाहार ग्रहण करते हैं वो बरसों जीवित रहता है , मेरे खुद के घर के बाग में अमरुद का वृक्ष लगा हुआ है जो हर साल हमें बहुत मीठे अमरुद देता है तो इसका मतलब मैंने उसकी हत्या नहीं कर दी, वो आज भी वैसा ही है जैसा छह साल पहले था बल्कि दिन ब दिन और बड़ा और हरयाली से परिपूर्ण होता गया ,हम उसे रोजाना पानी आदि देते हैं और समय-२ पर माली आदि से उसकी देखभाल भी करवाते हैं ना की उसे किसी प्रकार का कष्ट देते हैं इसके और तर्कशील उत्तर के सन्दर्भ में अनुराग शर्मा जी के जवाब को दे रहा हूँ -अभी तक वर्णित दृश्यों में मैंने शाकाहार के बारे में अक्सर होने वाली बहस के बारे में कुछ आंखों देखी बात आप तक पहुंचाने की कोशिश की है। आईये देखें इन सब तर्कों-कुतर्कों में कितनी सच्चाई है। लोग पेड़ पौधों में जीवन होने की बात को अक्सर शाकाहार के विरोध में तर्क के रूप में प्रयोग करते हैं। मगर वे यह भूल जाते हैं कि भोजन के लिए प्रयोग होने वाले पशु की हत्या निश्चित है जबकि पौधों के साथ ऐसा होना ज़रूरी नहीं है।मैं अपने टमाटर के पौधे से पिछले दिनों में बीस टमाटर ले चुका हूँ और इसके लिए मैंने उस पौधे की ह्त्या नहीं की है। पौधों से फल और सब्जी लेने की तुलना यदि पशु उपयोग से करने की ज़हमत की जाए तो भी इसे गाय का दूध पीने जैसा समझा जा सकता है। हार्ड कोर मांसाहारियों को भी इतना तो मानना ही पडेगा की गाय को एक बारगी मारकर उसका मांस खाने और रोज़ उसकी सेवा करके दूध पीने के इन दो कृत्यों में ज़मीन आसमान का अन्तर है।अधिकाँश अनाज के पौधे गेंहूँ आदि अनाज देने से पहले ही मर चुके होते हैं। हाँ साग और कंद-मूल की बात अलग है। और अगर आपको इन कंद मूल की जान लेने का अफ़सोस है तो फ़िर प्याज, लहसुन, शलजम, आलू आदि मत खाइए और हमारे प्राचीन भारतीयों की तरह सात्विक शाकाहार करिए। मगर नहीं – आपके फलाहार को भी मांसाहार जैसा हिंसक बताने वाले प्याज खाना नहीं छोडेंगे क्योंकि उनका तर्क प्राणिमात्र के प्रति करुणा से उत्पन्न नहीं हुआ है। यह तो सिर्फ़ बहस करने के लिए की गयी कागजी खानापूरी है।

     
  18. Mahak

    21/08/2010 at 12:21 पूर्वाह्न

    6 -इन्सान के पास उस प्रकार के दंत हैं जो शाक के साथ साथ माँस भी खा/चबा सकता है.7 – और ऐसा पाचन तंत्र जो शाक के साथ साथ माँस भी पचा सके. मैं इस को वैज्ञानिक रूप से सिद्ध भी कर सकता हूँ | मैं इसे सिद्ध कर सकता हूँ.इसका बहुत बढ़िया और तर्कपूर्ण सुशान्त सिंहल जी के द्वारा बहुत पहले ही दे दिया गया था की -यदि प्रकृति ने हमारे शरीर की संरचना मांसाहार के हिसाब से की है तो फिर हमारे दांत व हमारे पंजे इस योग्य होने चाहियें थे कि हम किसी पशु को पकड़ कर उसे वहीं अपने हाथों से, दांतों से चीर फाड़ सकते। यदि चाकू-छूरी से काट कर, प्रेशर कुकर में तीन सीटी मार कर, आग पर भून कर, पका कर, घी- नमक, मिर्च का तड़का मार कर खाया तो फिर हम मनुष्य के दांतों का, पाचन संस्थान का त्रुटिपूर्ण हवाला क्यों दे रहे हैं?पाचन संस्थान की बात चल निकली है तो इतना बता दूं कि सभी शाकाहारी जीवों में छोटी आंत, मांसाहारी जीवों की तुलना में कहीं अधिक लंबी होती है। हम मानव भी इसका अपवाद नहीं हैं। जैसा कि हम सब जानते ही हैं, हमारी छोटी आंत लगभग २७ फीट लंबी है और यही स्थिति बाकी सब शाकाहारी जीवों की भी है। शेर की, कुत्ते की, बिल्ली की छोटी आंत बहुत छोटी है क्योंकि ये मूलतः मांसाहारी जानवर हैं।वैसे भी हमारा पाचन संस्थान इस योग्य नहीं है कि हम कच्चा मांस किसी प्रकार से चबा भी लें तो हज़म कर सकें। कुछ विशेष लोग यदि ऐसा कर पा रहे हैं तो उनको हार्दिक बधाई।

     
  19. Mahak

    21/08/2010 at 12:22 पूर्वाह्न

    8 – आदि मानव मांसाहारी थे इसलिए आप यह नहीं कह सकते कि यह प्रतिबंधित है मनुष्य के लिए | मनुष्य में तो आदि मानव भी आते है ना.बताइये भाई साहब उन जंगली मनुष्‍यों से प्रेरणा ले रहें हैं जो प्रारम्‍भ से ही पशुओं का सा ही जीवन बिता रहे थे तथा जिन्‍हे ये तक नहीं पता था कि मनुष्‍य जाति क्‍या होती है अपितु जो स्‍वयं को अन्‍य जंगली पशुओं की भांति ही समझते थे । भला जो व्‍यक्ति भक्ष्‍य अभक्ष्‍य तो क्‍या स्‍वयं अपने ही बारे में न जानता हो उसके लिये पाप क्‍या और पुण्‍य क्‍या। लेकिन आज तो विज्ञान बहुत आगे बढ़ चुका है तो फिर आ क्यों हमें हज़ारों वर्ष पीछे धकेलना चाहते हैं

     
  20. Mahak

    21/08/2010 at 12:45 पूर्वाह्न

    @शाहनवाज़ भाईसवाल तो यही है की आखिर अपने जीभ के स्वाद की खातिर और अपने पेट की भूख मिटाने की खातिर किसी की जान ले लेना कैसे हलाल (जायज़) है और हराम (नाजायज़)कैसे नहीं है ?मांसाहार छोड़ना या अपनाना किसी का खुद का फैसला तो है लेकिन इससे मनुष्य के द्वारा एक जीव की जान ली जा रही है , अब वो बेचारे निरीह और बेजुबान जानवर हमारी आपकी तरह बोल नहीं सकते हैं की प्लीज़ हमें मत मारो ,हमें मत खाओ , हमें ही इंसान और इंसानियत के नाते उनकी आवाज़ बनना होगा और उन्हें इस नरक से मुक्ति दिलानी होगी और जहाँ तक बात है कुर्बानी या अन्य प्रथाओं के नाम पर माँस को गरीबों में मुफ्त बांटने की तो अगर कल को शराब ,बीडी ,गुटखा आदि भी गरीबों में मुफ्त बांटा जाने लगे तो उसे भलाई का कार्य नहीं कहा जाएगा बल्कि उससे लोगों का नुक्सान अधिक है बजाये के फायेदा

     
  21. Rajeev Bharol

    21/08/2010 at 3:16 पूर्वाह्न

    इश्वर हमें किसी भी जीव की हत्या की अनुमति कैसे दे सकता है?

     
  22. Smart Indian - स्मार्ट इंडियन

    21/08/2010 at 6:00 पूर्वाह्न

    शराब ,बीडी ,गुटखा आदि भी गरीबों में मुफ्त बांटा जाने लगे तो उसे भलाई का कार्य नहीं कहा जाएगा बल्कि उससे लोगों का नुक्सान अधिक हैसत्य वचन!

     
  23. राजभाषा हिंदी

    21/08/2010 at 9:46 पूर्वाह्न

    बेहतरीन। लाजवाब। *** हिन्दी प्रेम एवं अनुराग की भाषा है।

     
  24. सुज्ञ

    21/08/2010 at 11:19 पूर्वाह्न

    शाह नवाज़ भाई,आपका अभार आप हमेशा सच कहने में विश्वास रखते है।थोडा सा आपके शब्दो में सुधार सुझाता हूं,अन्यथा न लें"इसमें मांस खाने की आज्ञा है हुक्म नहीं है"आज्ञा व हुक्म समानार्थी है, यहां छूट शब्द ही होना चाहिएमक़सद है, आपको जायज़ चीजें बता दी, लेना न लेना हमारी मर्ज़ी।

     
  25. पी.सी.गोदियाल

    21/08/2010 at 11:19 पूर्वाह्न

    सुज्ञं जी, पीने वाले को पीने का बहाना चाहिए !

     
  26. सुज्ञ

    21/08/2010 at 12:02 अपराह्न

    शाह नवाज़ भाई,कुर्बानी की यह प्रथा हज़रात इब्राहीम से सपने में अल्लाह ने कुर्बानी चाही थी, हज़रात इब्राहीम ने बेटे इशहाक़ को क़ुर्बान करने का फ़ैसला किया, फ़िर मृत कुर्बानी को देखा तो वहां एक भैडा मरा पडा था।आज भी हम इस घटना का अनुसरण कर रहे हैं, घटना की सीख तो यह थी कि आप कितना सिद्दत से अल्लाह को चाह्ते है,और उस पर श्रद्धा रखते हैं। अल्लाह के लिये कुछ भी असम्भव नहिं समझाने का उदाहरण था।वह बात समझने की जगह हम हज़रात इब्राहीम के समकक्ष खुद खडा करने का प्रयास करते है, बेटे तो कुर्बान किये नहिं जा सकते, अतः हम भैडे व बक़रे कुर्बान करते है,जबकि अल्लाह को इसकी जरूरत भी नहिं,क्योंकि अल्लाह ही तो उन्हे संसार में भेजने वाला है।क्षमा करना कि हजारों साल की जमीजमाई प्रथा पर लिख रहा हूं,हो सकता है लोग इसे आस्था मान कर, मुझे किसी की धार्मिक भावना पर चोट पहूंचाना कहे, पर मेरा मक़सद कुरिति के खिलाफ़ है और अनावश्यक जीवहिंसा के खिलाफ़।

     
  27. sada

    21/08/2010 at 12:33 अपराह्न

    सुन्‍दर लेखन ।

     
  28. Tarkeshwar Giri

    21/08/2010 at 2:36 अपराह्न

    Sahnavaj ji ne aur Mahak ji ne sarthak sbhado ka prayog karte huye bahut hi acchi tarah se bat ko samne rakha hai. main dono se sahmat hun

     
  29. सुज्ञ

    21/08/2010 at 3:35 अपराह्न

    चैतन्य जी,आलोक जी,डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक जी,शाह नवाज़ जी,भारत विदूषक जी,महक जी,राजीव भारोल जी,अनुराग शर्मा जी,पी.सी. गोदियाल जी,सदा जी,तार्केश्वर जी,अहिंसा एवं जीवदया के दृष्टिकोण को समर्थन देने के लिये आप सभी का बहूत बहूत आभार!!

     
  30. पं.डी.के.शर्मा"वत्स"

    21/08/2010 at 9:31 अपराह्न

    हंसराज जी, आपने मुदा तो बहुत बढिया उठाया..ओर उस पर महक जी नें बेहद तर्कपूर्ण तरीके से इसे आगे बढिया…..लेकिन ये सारे तर्क सिर्फ उन लोगों के लिए हैं जो समझना चाहें, सही-गलत का विश्लेषण करना चाहें….जिन लोगों का कोई दीन ईमान ही नहीं है, जिनकी आत्मा मर चुकी है, बुद्धि सड चुकी है…ऎसे लोगों के साथ तर्क-वितर्क करके भला क्या मिलने वाला है ?…. ये बुद्धि से बिल्कुल खोखले लोग हैं, जो विचार विनिमय के लिए कभी सामने नहीं आएंगें…इन लोगों को सिर्फ एक ही काम आता है कि कुछ भी अला बला लिखकर किसी मुद्दे को हवा में उछालना और उसके बाद बस दूर खडे रहकर तमाशा देखना…..

     
  31. सागर नाहर

    21/08/2010 at 9:47 अपराह्न

    कोई फायदा नहीं!आप एक हजार नुकसान गिना दो वे एक हजार एक फायदे गिना देंगे मांसाहार के। ब्लॉग जगत में पहले मैने भी इस विषय पर बहस करने की कोशिश की कोई फायदा नहीं हुआ। व्यक्तिगत स्तर पर में लोगों को आज भी समझाता हूँ मांसाहार छोड़ने के लिए अब तक पचासों लोगों को समझा चुका बस एक ने दावा किया कि उसने मांसाहार छोड़ दिया, अब सच या झूठ भगवान जाने।

     
  32. सुज्ञ

    23/08/2010 at 12:08 अपराह्न

    पंडित जी,नाहर जी,यदि स्वस्थ चर्चा नहिं भी होती,और न तत्काल कोई फ़ायदा नज़र आता है। पर मेरा स्पष्ठ मानना है, विचार अवश्य गति करेंगे। जो कभी बादमें अपना असर जरूर दिखायेगें। दूसरा इनके दूप्रचार का जवाब तो होगा। तीसरा, सात्विक आहार वालों की नवपीढी तो मुक्त रह पायेगी।

     

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