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बुढापा, कोई लेवे तो थने बेच दूं॥

15 अगस्त
(यह राजस्थानी गीत, “मोरिया आछो बोळ्यो रे……” लय पर आधारित है।)

बुढापा कोई लेवे तो थने बेच दूं, बुढापा कोई लेवे तो थने बेच दूं।
थांरी कौडी नहिं लेवुं रे छदाम, बुढापा कोई लेवे तो थने बेच दूं ॥

बुढापा पहली तो उंचै महलां बैठतां, बुढापा पहली तो उंचै महलां बैठतां। बैठतां, बैठतां
अबै तो डेरा थांरा पोळियाँ रे मांय, बुढापा कोई लेवे तो थने बेच दूं॥ थांरी कौडी……।

बुढापा पहली तो हिंगळू ढोळिए पोढतां, बुढापा पहली तो हिंगळू ढोळिए पोढतां। पोढतां, पोढतां,
अबै तो फ़ाटो राळो ने टूटी खाट, बुढापा कोई लेवे तो थने बेच दूं॥ थांरी कौडी……।

बुढापा पहली तो भरिया चौटे बैठतां, बुढापा पहली तो भरिया चौटे बैठता। बैठतां, बैठतां
अबै तो देहली भी डांगी नहिं जाय, बुढापा कोई लेवे तो थने बेच दूं॥ थांरी कौडी……।

बुढापा पहली तो षटरस भोजन ज़ीमतां, बुढापा पहली तो षटरस भोजन ज़ीमतां। ज़ीमतां, ज़ीमतां
अबै तो लूखा टूकडा ने खाटी छास, बुढापा कोई लेवे तो थने बेच दूं॥ थांरी कौडी……।

बुढापा पहली तो घर का हंस हंस बोलतां, बुढापा पहली तो घर का हंस हंस बोलतां। बोलतां, बोलतां
अबै तो रोयां भी पूछे नहिं सार, बुढापा कोई लेवे तो थने बेच दूं॥ थांरी कौडी……।

बुढापा पहली तो धर्म ध्यान ना कियो, बुढापा पहली तो धर्म ध्यान ना कियो। ना कियो, ना कियो
अबै तो होवै है गहरो पश्च्याताप, बुढापा कोई लेवे तो थने बेच दूं॥ थांरी कौडी……।

रचना शब्दकार -अज्ञात

 

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13 responses to “बुढापा, कोई लेवे तो थने बेच दूं॥

  1. डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक

    15/08/2010 at 11:41 अपराह्न

    बन्दी है आजादी अपनी, छल के कारागारों में।मैला-पंक समाया है, निर्मल नदियों की धारों में।।–मेरी ओर से स्वतन्त्रता-दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ स्वीकार करें!–वन्दे मातरम्!

     
  2. दीर्घतमा

    15/08/2010 at 11:54 अपराह्न

    vandemataram.

     
  3. अशोक बजाज

    16/08/2010 at 12:21 पूर्वाह्न

    स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर आपको बहुत बहुत बधाई .कृपया हम उन कारणों को न उभरने दें जो परतंत्रता के लिए ज़िम्मेदार है . जय-हिंद

     
  4. संगीता स्वरुप ( गीत )

    16/08/2010 at 1:39 पूर्वाह्न

    अजी बुढापा कौन लेना चाहेगा ….अच्छी प्रस्तुति

     
  5. Ratan Singh Shekhawat

    16/08/2010 at 6:48 पूर्वाह्न

    शानदार रचना

     
  6. राजभाषा हिंदी

    16/08/2010 at 7:10 पूर्वाह्न

    अच्छी रचना।राष्ट्रीय व्यवहार में हिन्दी को काम में लाना देश की शीघ्र उन्नति के लिए आवश्यक है।

     
  7. Smart Indian - स्मार्ट इंडियन

    16/08/2010 at 7:13 पूर्वाह्न

    अर्थ तो उतना समझा नहीं परन्तु यह देखकर अचम्भा हुआ कि बुढापे जैसी अवांछनीय अवस्था भी छोड़ने के बजाय बेचने की बात सोची जा रही है.

     
  8. सुज्ञ

    16/08/2010 at 7:19 पूर्वाह्न

    रतनसिंह जी,आभार आपका

     
  9. सुज्ञ

    16/08/2010 at 7:23 पूर्वाह्न

    अनुराग जी,भाव तो यही है,अवांछनीय अवस्था से त्रस्त बुढापा कह रहा है,कोई खरीददार मिले तो बेच के जान छुडाऊं।

     
  10. ललित शर्मा-للت شرما

    16/08/2010 at 9:58 पूर्वाह्न

    बुढापो अठे कबाड़ी बी कोनी लेवे भाया।बुढापा रो खरीददा तो बाजार म्हे भी कोनी।जवानी तो तो हाथो हाथ बिक जावे।चोखी कविताई हैघणी घणी राम राम

     
  11. शहरयार

    16/08/2010 at 12:03 अपराह्न

    राजस्थानी गीत तो हमेशा ही अच्छे होते हैं, शुक्रिया. मेरा ब्लॉगखूबसूरत, लेकिन पराई युवती को निहारने से बचेंhttp://iamsheheryar.blogspot.com/2010/08/blog-post_16.html

     
  12. परमजीत सिँह बाली

    16/08/2010 at 12:15 अपराह्न

    jजो आ के ना जाए वो बुढ़ापा कौन लेगा;))बढिया लिखा है।

     
  13. वाणी गीत

    17/08/2010 at 7:23 पूर्वाह्न

    बुढ़ापा न लेर कायें करसी कोई …चोखो लाग्यो गीत …!

     

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