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बस लूट हुई स्वाधीन

14 अगस्त
कहते थे देश लूटे फ़िरंगी,
दर्द से युवा बने थे ज़ंगी।
उन वीरों की औलादों का,
जीना हुआ मुहाल।
लूट का यह लोकतंत्र है,
पावे सो निहाल॥

जाति से पिछडे थे शोषित,
अगडे रहे है शोषक घोषित।
अब शोषक शोषित एक हुए है,
देश हुआ बदहाल।
लूट का यह लोकतंत्र है,
पावे सो निहाल॥

जब गरीब पसीना बहाते,
राजा राजस्व से महल बनाते।
नेताओं ने अब खून पीकर,
साम्राज्य किये बहाल।
लूट का यह लोकतंत्र है,
पावे सो निहाल॥

जब महाजन खूब कमाते,
सूदखोर बनिया कहलाते।
आज बैंको ने चार्जखोरी से,
चली पुरानी चाल,
लूट का यह लोकतंत्र है,
पावे सो निहाल॥

हां यही आज़ादी पाई,
मनमर्ज़ी की लूट चलाई।
स्वार्थ बस स्वाधीन हुआ,
सब सत्ता का बवाल।
लूट का यह लोकतंत्र है,
पावे सो निहाल॥

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12 टिप्पणियाँ

Posted by on 14/08/2010 in बिना श्रेणी

 

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12 responses to “बस लूट हुई स्वाधीन

  1. दीर्घतमा

    14/08/2010 at 10:19 अपराह्न

    कहे की आज़ादी आधी -अधूरी आज़ादी अब भी हिन्दू न. दो क़ा नागरिक होने को मजबूरधन्यवाद बहुत अच्छी कबिता

     
  2. चला बिहारी ब्लॉगर बनने

    14/08/2010 at 10:31 अपराह्न

    एतना कड़वा सच.. एतना सच्चा बयान के लिए!! दुस्यंत कुमार जी याद आ गएयह आदमी नहीं है मुकम्मल बयान हैचेहरे पे इसके चोट का गहरा निशान है.अऊर आपका चोट साफ नजर आता है!! आपको धन्यवाद

     
  3. सुज्ञ

    14/08/2010 at 10:59 अपराह्न

    सलिल जी आपकी प्रशंसा नें तो गद्गद कर दिया। आभार आपके प्रोत्साहन के लिये

     
  4. M VERMA

    15/08/2010 at 7:12 पूर्वाह्न

    लूंट का यह लोकतंत्र है,पावे सो निहाल॥बहुत बढिया

     
  5. राजभाषा हिंदी

    15/08/2010 at 7:34 पूर्वाह्न

    आपको और आपके परिवार के सभी सदस्यों को स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं और बधाई।

     
  6. बूझो तो जानें

    15/08/2010 at 11:09 पूर्वाह्न

    आपको ६४वीं स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक बधाई.साथ ही मेरे ब्लाग पर आने के लिए आपका धन्यावाद. इसी तरह मुझे प्रोत्साहित करते रहे.आभार

     
  7. पं.डी.के.शर्मा"वत्स"

    15/08/2010 at 12:26 अपराह्न

    बेहतरीन रचना! प्रत्येक पंक्ति सत्य का आईना दिखाती हुई…..जो जन्मों जन्मों से कंगले थे, नेता बन मालोमाल हुएसम्मान भी इनका होने लगा, धन-दौलत से पामाल हुएमोटर-गाडी, नौकर-चाकर, सब सुविधा से खुशहाल हुएदेश जाए चाहे रसातल में, पर ये तो आज निहाल हुएइनका सब काम निराला हुआ, जबसे आजादी आई हैसिर्फ नेताओं की कौम ही है, जिसने आजादी पाई है !!

     
  8. सुज्ञ

    15/08/2010 at 2:29 अपराह्न

    पंडित जी,आपने तो मेरे भाव ही स्पष्ठ कर दिये,आभारइसी लिये आज़ादी की शुभकामनाएं व्यंग्य सी लगती है।जिनके लिये शुभ रही वह कौम कुटिल सी लगती है।

     
  9. सुज्ञ

    15/08/2010 at 2:32 अपराह्न

    सलिल जी,ज़ख्म इतने कि हर ज़ख्म पर दम निकले,बहुत निकले मेरे अरमान फ़िर भी कम निकले।

     
  10. संगीता स्वरुप ( गीत )

    15/08/2010 at 8:10 अपराह्न

    जाति से पिछडे थे शोषित,अगडे रहे है शोषक घोषित।अब शोषक शोषित एक हुए है,देश हुआ बदहाल।लूंट का यह लोकतंत्र है,पावे सो निहाल॥बहुत बढ़िया ….

     
  11. सुज्ञ

    15/08/2010 at 9:39 अपराह्न

    संगीता दी,प्रोत्साहन के लिये आभार।

     
  12. दिगम्बर नासवा

    19/08/2010 at 4:07 अपराह्न

    हां मन मर्ज़ी का लूटने की तो आज़ादी है .. चाहे नेताओं को ही सही ….

     

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