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॥शृंगार॥

27 जुलाई
सिर का शृंगार तभी है, जब सत्य समक्ष नतमस्तक हो।
भाल का शृंगार तभी है, जब यश दीन दुखी के मुख हो॥
नयनों का शृंगार तभी है, जब वह करूणा से सज़ल हो।
नाक का शृंगार तभी है, जब वह परोपकार से उत्तंग हो॥
कान का शृंगार तभी है, जब वह आलोचना सुश्रुत हो।
होठो का शृंगार तभी है, हिले तो मधूर वचन प्रकट हो॥
गले का शृंगार तभी है, जब विनय पूर्ण नम जाय।
सीने का शृंगार तभी है, जिसमें आत्मगौरव बस जाय॥
हाथों का शृंगार तभी है, पीडित सहायता में बढ जाए।
हथेली का शृंगार तभी है, मिलन पर प्रेम को पढ जाए॥
कमर का शृंगार तभी है, जब बल मर्यादा से खाए।
पैरों का शृंगार तभी है, तत्क्षण मदद में उठ जाए॥
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6 टिप्पणियाँ

Posted by on 27/07/2010 in बिना श्रेणी

 

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6 responses to “॥शृंगार॥

  1. Sunil Kumar

    28/07/2010 at 8:00 पूर्वाह्न

    sundar atisunadar lekhni kamal ki hai us par vicharon ka bhandar ,badhai

     
  2. swaarth

    29/07/2010 at 6:54 पूर्वाह्न

    बहुत अच्छे हैं वचन

     
  3. राजभाषा हिंदी

    29/07/2010 at 11:35 पूर्वाह्न

    बहुत अच्छी प्रस्तुति।राजभाषा हिन्दी के प्रचार-प्रसार में आपका योगदान सराहनीय है।

     
  4. सुज्ञ

    29/07/2010 at 2:03 अपराह्न

    स्वागत आप सभी का।

     
  5. mridula pradhan

    03/08/2010 at 2:20 अपराह्न

    bahot sundar.

     
  6. सुज्ञ

    03/08/2010 at 2:52 अपराह्न

    धन्यवाद मृदुला जी

     

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ज्ञानदत्त पाण्डेय का हिन्दी ब्लॉग। मैं गाँव विक्रमपुर, जिला भदोही, उत्तरप्रदेश, भारत में रह कर ग्रामीण जीवन जानने का प्रयास कर रहा हूँ। ज़ोनल रेलवे के विभागाध्यक्ष के पद से रिटायर रेलवे अफसर।

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