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शाकाहार, निशंक अहिंसा को बढाता है।

07 जुलाई
शाकाहार और अहिंसा एक दूसरे की पूरक है। 


क्या हिन्दू मत में शाकाहार अन्य धर्मों से प्रभावित  है?

नहीं, वैदिक मत प्रारम्भ से ही शाकाहारी रहा है,वेदों में माँसाहार के वर्णन निति वाक्य नहीं है।उस काल में कोई करते हों उसका वर्णन मात्र है, उपदेश तो उससे दूरी का ही दिया गया है। और जैन-मार्ग से प्रभावित होने का प्रश्न ही नहीं उठता। अहिंसा परमो धर्मः वेदों का निति वाक्य है। हां यज्ञकर्म में आ गई पशुबलि का विरोध अवश्य जैन मत नें किया, पर अगर प्रभावित होना होता तो अन्य सिद्धांतों पर भी उसका प्रभाव स्पष्ठ नजर आता। फिर भी अगर जैनों के संसर्ग से हिन्दुओं में अहिंसा प्रगाढ हुई है, तो बुरा भी क्या है? गलत मात्र इसलिये कि अहिंसा, आपके मांसाहारी प्रयोजन को सिद्ध होने नहीं देती। अहिंसा और शाकाहार का चोली दामन का साथ है।


क्या, पेड़ पौधों में भी जीवन है,और उन्हें भी पीड़ा होती है,यह हम नहीं जानते  थे ?

किन लोगों का अतीत में ऐसा मानना था? ऐसे ‘ज़ाहिल’ कोन थे? आर्यावर्त में तो सभ्यता युगारम्भ में ही पुख्त हो चुकी थी। आर्य सभ्यता तो न केवल वनस्पति में बल्कि पृथ्वी, वायु, जल और अग्नी में भी जीवन को प्रमाणित कर चुकी थी।और विज्ञान को अभी भी इन निष्कर्षों पर पहुंचना बाकी है। किसने तर्क दे दिया कि वनस्पति को पीडा नहीं होती? पीड़ा तो अवश्यंभावी है,अगर जीवन है तो पीड़ा तो होगी ही। उन्हे तो छूने मात्र से मरणान्तक पीडा होती है।

क्या दो इन्द्रियों से वंचित प्राणी की हत्या कम अपराध है? !!

यह किसने कह दिया?, जीव मात्र की हत्या पाप है, यहाँ सच्चाई से पाप को पाप स्वीकार करने का माद्दा है, फिर चाहे हम स्वयं ही उसमें रत क्यों न हो। स्वीकार करेंगे तभी त्याग की मानसिकता बनेगी। उद्दंडता से पाप को ही धर्म बताना तो उल्टा घोर महापाप है, कुतर्कों से पाप को धर्म साबित करना तो महा दुष्कर्म। किसी ‘पंचेन्द्रिय’ प्राणी में, एक दो या तीन इन्द्रिय कम होने मात्र से, वह चौरेन्द्रिय,तेइन्द्रिय,या बेइन्द्रिय नहीं कहा जाता,वह रहेगा तो पंचेन्द्रिय ही, वह विकलांग (अपूर्ण इन्द्रिय) कहा जायेगा। इन्द्रिय अपूर्णता के आधार पर कोई जीव श्रेणी नहीं है। विकलेन्द्रिय के प्रति सहानुभुति तो  ज्यादा ही होगी। और दया करूणा तो प्रत्येक जीव के प्रति होनी ही चाहिए। इस संसकृति में अभयदान दिया जाता है, न्यायाधीष बनकर सजा देना नही। सजा को कर्मों पर छोड़ा गया है।क्षमा को यहां वीरों का गहना कहा जाता है, भारतीय संसकृति को यूँ ही उदार व सहिष्णु उपमाएँ नहीं मिली।
पीड़ाएँ  इन्द्रिय  माध्यम से अनुभूत की जाती है जिस जीव के जितनी अधिक इन्द्रिय होगी उसे पीड़ा अधिक अनुभूत होगी।

हिंसा तो वनस्पति के आहार में भी है ही, पर विवेक यह कहता है, जितना हिंसा से बचा जाये, बचना चाहिये। क्या आपने कभी गेहूं के दाने को मांस की तरह सडते कीडे पडते देखा है? मांस मात्र एक जीव ही नहीं,उसकी सड़न प्रकृति के कारण अनन्त जीवों की हिंसा का कारण बनता है।
जैन गृहस्थ, जैसे जैसे त्याग में समर्थ होते जाते है, वैसे वैसे, क्षमतानुसार शाकाहार में भी, अधिक हिंसाजन्य पदार्थो का त्याग करते जाते है। वे कन्दमूल के बाद हरी पत्तेदार सब्जीयों आदि का भी त्याग करते है, वह उसमें उपस्थित अधिसंख्य जीवों की हिंसा के कारण। 

मांस न केवल क्रूरता की उपज है, बल्कि मांस में सडन गलन की प्रक्रिया तेज  गति से होती है। परिणाम स्वरूप जीवोत्पत्ति तीव्र व अधिक होती है। इतना ही नहीं, पकने के बाद भी उसमे जीवों की उत्पत्ति की प्रक्रिया निरन्तर जारी रह्ती है। और भी कई कारण है, माँसाहार में अधिक हिंसा के, जो सुविज्ञ पाठक हैं, वे तो बे-तर्क भी भलीभांति समझ सकते है। और कुतर्कों का कोई ईलाज नहीं।
जो लोग शान्ति का (बे-शर्त) सन्देश तक पूरी मानवता (काफ़िर समेत) को, पूरी इमानदारी से नहीं पहुँचा सकते, वे जानवरों तक दया का सन्देश कैसे पहुँचा पायेंगे? ‘सुक्ष्म अहिंसा का सन्देश’ तो उनके लिए, बहुत दूर की कौडी है।
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9 responses to “शाकाहार, निशंक अहिंसा को बढाता है।

  1. दीर्घतमा

    08/07/2010 at 9:40 पूर्वाह्न

    हिन्दू धर्म किसी से प्रभावित नहीं बल्कि बिदेशी संप्रदाय यहाँ आकर वे जरुर हिन्दू धर्म से प्रभावित हुए है शाकाहार तो हिंदुत्व की प्रब्रिती में है ये यदि धर्म क़ा बिषय न हो तो भी भारत शाकाहार प्रधान देश है.

     
  2. अजय कुमार

    11/07/2010 at 12:48 अपराह्न

    हिंदी ब्लाग लेखन के लिए स्वागत और बधाईकृपया अन्य ब्लॉगों को भी पढें और अपनी बहुमूल्य टिप्पणियां देनें का कष्ट करें

     
  3. संगीता पुरी

    12/07/2010 at 1:12 पूर्वाह्न

    इस नए सुंदर से चिट्ठे के साथ हिंदी ब्‍लॉग जगत में आपका स्‍वागत है .. नियमित लेखन के लिए शुभकामनाएं !!

     
  4. Mahak

    18/07/2010 at 12:22 अपराह्न

    @सुज्ञ जीमैं आपको हम सबके साझा ब्लॉग का मेम्बर और फोल्लोवेर बनने के लिए सादर आमंत्रित करता हूँ, कृपया इससे जुडें, इसे आप जैसे लोगों की आवश्यकता हैhttp://blog-parliament.blogspot.com/महक

     
  5. Mahak

    18/07/2010 at 2:53 अपराह्न

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  6. Mahak

    18/07/2010 at 2:54 अपराह्न

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  7. Mahak

    18/07/2010 at 2:55 अपराह्न

    सुज्ञ जी , इस common blog के लिए अपनी e -mail id और सहमति प्रदान करने के लिए आपका बहुत-२ शुक्रगुजार हूँमैंने ब्लॉग के members की list में आपकी e -mail id डाल दी है ,अब आपकी e -mail id पर इसका invitation आया होगा, कृपया इसे स्वीकार कर मुझे कृतार्थ करेंआपके सहयोग के लिए एक बार फिर बहुत-२ धन्यवादमहक

     
  8. जयराम “विप्लव” { jayram"viplav" }

    21/07/2010 at 5:42 अपराह्न

    " बाज़ार के बिस्तर पर स्खलित ज्ञान कभी क्रांति का जनक नहीं हो सकता "हिंदी चिट्ठाकारी की सरस और रहस्यमई दुनिया में राज-समाज और जन की आवाज "जनोक्ति.कॉम "आपके इस सुन्दर चिट्ठे का स्वागत करता है . चिट्ठे की सार्थकता को बनाये रखें . अपने राजनैतिक , सामाजिक , आर्थिक , सांस्कृतिक और मीडिया से जुडे आलेख , कविता , कहानियां , व्यंग आदि जनोक्ति पर पोस्ट करने के लिए नीचे दिए गये लिंक पर जाकर रजिस्टर करें . http://www.janokti.com/wp-login.php?action=register, जनोक्ति.कॉम http://www.janokti.com एक ऐसा हिंदी वेब पोर्टल है जो राज और समाज से जुडे विषयों पर जनपक्ष को पाठकों के सामने लाता है . हमारा प्रयास रोजाना 400 नये लोगों तक पहुँच रहा है . रोजाना नये-पुराने पाठकों की संख्या डेढ़ से दो हजार के बीच रहती है . 10 हजार के आस-पास पन्ने पढ़े जाते हैं . आप भी अपने कलम को अपना हथियार बनाइए और शामिल हो जाइए जनोक्ति परिवार में ! एसएम्एस देखकर पैसा कमा सकते हैं http://mGinger.com/index.jsp?inviteId=janokti

     
  9. महामंत्री - तस्लीम

    22/07/2010 at 5:50 अपराह्न

    आपके विचारों ने सोचने पर मजबूर कर दिया।………….अथातो सर्प जिज्ञासा।संसार की सबसे सुंदर आँखें।

     

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